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26 June 2018

महामृत्युंजय मंत्र आैर मंत्र की प्रमुख जानकारी

महामृत्युंजय मंत्र "मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र है"  जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, यजुर्वेद के रूद्र अध्याय में, भगवान शिव की स्तुति हेतु की गयी वंदना है।
महामृत्युंजय मंत्र के 33 अक्षर है। जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवतआें के प्रतिक है उन तैतीस देवता में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापित व 1 षटकार है इन तैतीस कोटि "प्रकार" देवताआें की सम्पूर्ण शक्तियां महामृत्युंजय मंत्र में निहीत है।

ग्रहबाधा, ग्रहपीड़ा, रोग, जमीन-जायदाद का विवाद, हानि की सम्भावना या धन-हानि हो रही हो, वर-वधू के मेलापक दोष, घर में कलह, सजा का भय या सजा होने पर बंधन मुक्ति , कोई धार्मिक अपराध होने पर एंव अपने समस्त पापों के नाश के लिए महामृत्युंजय या लघु मृत्युंजय मंत्र का जाप किया या वेद पढे श्रेष्ठ ब्रहमणा से कराया जा सकता है। ध्यान रहे पाेंगे पण्डित से भूल कर भी जप न करवाये उससे दुष्प्रभाव पडने की अधिक संभावना है।

महा मृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धन्म। 
उर्वारुकमिव बन्धना मृत्येर्मुक्षीय मामृतात् !!

संपुटयुक्त महा मृत्‍युंजय मंत्र 
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!

लघु मृत्‍युंजय मंत्र 
ॐ जूं स माम् पालय पालय स: जूं ॐ। किसी दुसरे के लिए जप करना हो तो-ॐ जूं स (उस व्यक्ति का नाम जिसके लिए अनुष्ठान हो रहा हो) पालय पालय स: जूं ॐ !!

महा मृत्युंजय मंत्र के जप के समय इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए -
  • जाप हमेशा पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना अनिवार्य है।
  • जाप एक निर्धारित जगह पर ही करें, रोज अपनी जगह न बदलें ।
  • मंत्र का जाप करते समय धूप-दीप जलते रहना चाहिए, इस बात का विशेष ध्यान रखें।
  • रुद्राक्ष की माला पर ही यह जाप करे।
  • मंत्र का जाप सोमवार से ही किया जाना अनिवार्य है।
  • मंत्र का जाप प्रात:काल 9 बजे से पहले ही करना चाहिए अन्यथा मंत्र जाप का फल प्राप्त नहीं होता।
  • जितने भी दिन का यह जाप हो. उस समय मांसाहार बिल्कुल भी न खाएं।
  • मंत्र का जाप करते समट उच्चारण होठों से बाहर नहीं आना चाहिए. यदि इसका अभ्यास न हो तो धीमे स्वर में जप करें।
  • मंत्र का जाप संख्या का निर्धारण करना जरुरी है। जाप के समय संख्या कम नहीं होनी चाहिए।
  • मंत्र जाप के समय उबासी या आलस नहीं आना चाहिए।
  • महामृत्युंजय मन्त्र का भुल से भी अशुद्ध उच्चारण न करें और महा मृत्युंजय मन्त्र जपने के बाद में इक्कीस बार गायत्री मन्त्र का जाप करें जिससे अशुद्ध उच्चारण होने पर भी पर अनिष्ट होने का भय न रहे।
महा मृत्युंजय मंत्र का पुरश्चरण सवा लाख है और लघु मृत्युंजय मंत्र की 11 लाख है.मेरे विचार से तो कोई भी मन्त्र जपें,पुरश्चरण सवा लाख करें।

विधि
अपने घर पर महामृत्युंजय यन्त्र या किसी भी शिवलिंग का पूजन कर जप शुरू करें या फिर सुबह के समय किसी शिवमंदिर में जाकर शिवलिंग का पूजन करें और फिर घर आकर घी का दीपक जलाकर मंत्र का ११ माला जप कम से कम ९० दिन तक रोज करें या एक लाख पूरा होने तक जप करते रहें। 
अंत में हवन हो सके तो श्रेष्ठ अन्यथा २५ हजार जप और करें.

मंत्र जप के फायदे
कलौकलिमल ध्वंयस सर्वपाप हरं शिवम्।
येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।
स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।
मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।
देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत।
यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रध्दायान्वित।।
जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत्।

महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ 
हम त्रि नेत्रीय भगवान शंकर की पूजा करते है जो प्रत्येक शवास में जीवन शक्ति का संचार करते है जो जीवन की मधुर परिपुर्णता को अपनी शक्ति से पोषित कर रहे है उनसे हमारी प्रार्थना है कि जिस प्रकार एक ककडी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल रुपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है उसी प्रकार वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दे  जिससे माेक्ष की प्राप्ति हो जाए।।

मंत्र के शब्दों की स्थति -
त्रि – ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
यम – अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।
– सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
कम – जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।
– वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
– प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
हे – प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
-शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
ष्टि – अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।
– पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
र्ध – भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
नम् – कपाली रुद्र का घोतक है। उरु मूल में स्थित है।
- दिक्पति रुद्र का घोतक है। यक्ष जानु में स्थित है।
र्वा – स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।
रु – भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।
– धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
मि – अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।
– मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।
– वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।
न्धा – अंशु आदित्यद का घोतक है। वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
नात् – भगादित्यअ का बोधक है। वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
मृ – विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।
र्त्यो् – दन्दाददित्य् का बोधक है। वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
मु – पूषादित्यं का बोधक है। पृष्ठै भगा में स्थित है।
क्षी – पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है। नाभि स्थिल में स्थित है।
– त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है। गुहय भाग में स्थित है।
मां – विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
मृ – प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।
तात् – अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।

उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्तध देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं। जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग – अंग (जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं) उनकी रक्षा होती है।

मंत्रगत पदों की शक्तियाँ जिस प्रकार मंत्रा में अलग अलग वर्णो (अक्षरों) की शक्तियाँ हैं। उसी प्रकार अलग – अल पदों की भी शक्तियाँ है।

त्र्यम्‍‍बकम् – त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है जो सिर में स्थित है।
यजा- सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है।
महे- माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।
सुगन्धिम् – सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।
पुष्टि – पुरन्दिरी शकित का द्योतक है जो मुख में स्थित है।
वर्धनम – वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है।
उर्वा – ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है।
रुक – रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।
मिव रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है।
बन्धानात् – बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है।
मृत्यो: – मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।
मुक्षीय – मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है।
मा – माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है।
अमृतात – अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।

महामृत्युंजय मंत्र शोक, मृत्यु भय, अनिश्चता, रोग, दोष का प्रभाव कम करने में, पापों का सर्वनाश करने में अत्यंत लाभकारी है.महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना या करवाना सबके लिए और सदैव मंगलकारी है परन्तु देखने में आता है कि परिवार में किसी को असाध्य रोग होने पर अथवा जब किसी बड़ी बीमारी से उसके बचने की सम्भावना बहुत कम होती है, तब लोग इस मंत्र का जप अनुष्ठान कराते हैं। महामृत्युंजय मंत्र का जाप अनुष्ठान होने के बाद यदि रोगी जीवित नहीं बचता है तो लोग निराश होकर पछताने लगे हैं कि बेकार  खर्च किया।

एक बात स्पष्ट रुप जाननी चाहिए कि - इस मंत्र का मूल अर्थ ही यही है कि -
हे महादेव.. या तो रोगी को ठीक कर दो या तो फिर उसे जीवन मरण के बंधनों से मुक्त कर दो।



14 April 2018

गांधी को राष्ट्र-पिता बोलना क्या हमारे राष्ट्र का अपमान नहीं है ?

पिता का अर्थ होता है - 
जन्मदाता,  किसी भी शख्स के वजूद की पहचान,  पालनहार !
  
देश में जन्मा हर व्यक्ति देश को अपनी मां मानता है और राष्ट्र देश से प्रेम रखने वाला हर व्यक्ति भारत माता की जय के नारे लगाता है।
  
भारत देश लाखों साल पहले से ही मौजुद है। दुष्यंत के पुत्र भरत के नाम से देश का नाम भारत हुआ।

भारत में जन्मे हर व्यक्ति की भारत मां है तो थोडे समय पहले २ अक्टुबर १८६९ को जन्मा गांधी देश का राष्ट्रपिता कैसे हो गया ?

सबसे बडा सवाल है कि -  

गांधी राष्ट्रपिता कैसे हो गया ? 
किसने पहली बार गांधी को राष्ट्रपिता बोला ?

30 जनवरी, 1948 को गांधी का वध होने के बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित किया और कहा कि ‘राष्ट्रपिता अब नहीं रहे।  
  • गांधी का झूठा महिमामंडन कर जबरदस्ती राष्ट्रपिता बना दिया।
   
क्या गांधी ने भारत की स्थापना की थी ?

भारत राष्ट्र में जन्मा हर व्यक्ति राष्ट्रपुत्र है,   गांधी ने भी तो इसी देश में जन्म लिया था। राष्ट्र में जन्मा राष्ट्रपुत्र हो सकता है राष्ट्र का पिता नहीं। 
गांधी ना तो हमारे देश का जन्मदाता था  और  न ही वजूद की पहचान आैर  न ही पालनहार था।

राष्ट्र से बडा कोई नहीं हो सकता।

गांधी पाकिस्तान का राष्ट्रपिता हो सकता है क्योंकि गांधी ने पाकिस्तान बनवाया भारत नहीं।

गांधी को राष्ट्रपिता कहना राष्ट्र का अपमान है। क्योंकि  भारत को हम सभी भारत माता कहते है।

सूचना के अधिकार के तहत  पुछे गए सवाल   " गांधी को 'राष्ट्रपिता' क्यों कहा जाता है और क्या उन्हें यह उपाधि दी गई है. "  के जवाब में मंत्रालय ने कहा कि -   गांधी को ऐसी कोई उपाधि नहीं दी गई है।

देश का संविधान शैक्षिक और सैन्य उपाधि के अलावा कोई और उपाधि देने की इजाजत नहीं देता।.

अधिकारिक रुप से गांधी राष्ट्रपिता नहीं है। 

कैसे मान लिया जाए की 
  • गांधी ने देशवासियों को सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलना सिखाया।
  • बिना किसी हिंसा के अंग्रेजी हुकूमत से भारत को आजादी दिलवाई। 
  • गांधी ने देश के क्रांति कारी वीरों को अंग्रेजों को खुश करने के लिए आंतकवादी तक बतलाया।

 एक गाना बनाया गया जिसमें कहा गया है कि -  

" दे दी आजादी हमें बिना खड्ग बिना ढाल के सागरमति के संत तुने कर दिया कमाल " 

आप सभी जानते है कि मात्र शांति का भाषण देने से आजादी नहीं मिली , कई वीरों ने अपना लहु बहाया था। 



एक चटुकार पत्रकार ने  बापू कह दिया तो कांग्रेस ने गांधी के वध के बाद बापू कहना चालू कर दिया।

(सन् 1857 में राष्ट्रध्वज की सलामी के समय जगह-जगह में यह गीत गाया जाता था। मूल गीत 57 क्रांति-अखबार च् पयामे-आजादी छ में छपाया गया था। जिसकी एक नकल ब्रिटिश म्युजियम लंदन में आज भी मौजूद है।)


"हम है इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा,
पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी प्यारा।
ये है हमारी मिल्कियत, हिन्दुस्तान हमारा,
इसकी रू हानियत से, रौशन है जग सारा;
कितना कदीम कितना नईम, सब दुनिया से न्यारा,
करती है जरखेज जिसे, गंगो-जमन की धारा।"

देश के क्रांति कारीयों के सशस्त्र विद्रोह के कारण देश आजाद हुआ न की गांधी की वजह से देश आजाद हुआ 

कैसा दुर्भाग्य है जिन शहीदों के प्रयत्नों व त्याग से हमें स्वतंत्रता मिली, उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। अनेकों को स्वतंत्रता के बाद भी गुमनामी का अपमानजनक जीवन जीना पड़ा। ये शब्द उन्हीं पर लागू होते हैं -

उनकी तुरबत पर नहीं है एक भी दीया,
जिनके खूँ से जलते हैं ये चिरागे वतन।
जगमगा रहे हैं मकबरे उनके,
बेचा करते थे जो शहीदों के कफन।।
1948 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री एटली ने भी यह स्वीकारा है कि भारत से ब्रिटेन के हटने की वजह गांधी नहीं,  सुभाष चंद्र बोस थे,  जिनकी वजह से ब्रिटिश नौ सेना में मौजूद भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर दिया था। ब्रिटिश सेना में मौजूद 25 लाख भारतीय सैनिक सुभाष चंद्र बोस के ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्‍हें आजादी दूंगा” के आहवान पर अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार थे।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन् 1857 में शुरू हुआ था। 

सशस्त्र क्रांति का प्रगतिशील युग 
इस युग को ‘भगतसिंह-चन्द्रशेखर आजाद युग’ के नाम से जाना जाता है। भगतसिंह क्रांतिपथ के मील के पत्थर की भाँति थे। इन लोगों ने ‘हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ’ का नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ कर दिया। इनके प्रगतिशील कार्य थे —
(१) अखिल भारतीय स्तर पर क्रांति संगठन खड़ा करना,
(२) क्रांति संगठन को धर्मनिरपेक्ष स्वरूप प्रदान करना,
(३) समाजवादी समाज की स्थापना का संकल्प करना,
(४) क्रांतिकारी आंदोलन को जन आंदोलन का स्वरूप प्रदान करना,
(५) महिला वर्ग को क्रांति संगठन में प्रमुख स्थान प्रदान करना।

इस युग में भारत की आजादी के लिए जो प्रयत्न किए गए, वे अहिंसात्मक आंदोलनकारियों और क्रांतिकारियों द्वारा मिलजुलकर किए गए। इस आंदोलन के दो प्रमुख चरण थे-

अगस्त क्रांति   सन् 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’
सन् 1942 में व्यापक जनक्रांति फूट पड़ी। ब्रिटिश शासन ने 9 अगस्त सन् 1942 को महात्मा गाँधी और सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया। गाँधी जी द्वारा ‘करो या मरो’ का नारा दिया जा चुका था जो कि उस सदी का सबसे बडा झूठ था। 
सशस्त्र क्रांति के समर्थक, जो ‘सत्याग्रह आंदोलन’ में विश्वास नहीं रखते थे, वे भी इस आंदोलन में कूद पड़े और तोड़-फोड़ का कार्य करने लगे। संचार व्यवस्था भंग करने के लिए तार काट दिए गए और सेना का आवागमन रोकने के लिए रेल की पटरियाँ उखाड़ी जाने लगीं। ब्रिटिश शासन ने निर्ममतापूर्वक इस आंदोलन को कुचल डाला। हजारों लोग गोलियों के शिकार हुए। 
अब खुद ही सोचे की अगर अहिसां पर विशवास था तो यह सब आम हिन्दुस्तानियों ने क्यों किया ?

दक्षिण-पूर्व एशिया में आजाद हिंद आंदोलन

द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों से ही भारत के क्रांतिकारी नेता सुभाषचंद्र बोस अपनी योजना के अनुसार ब्रिटिश जासूसों की आँखों में धूल झोंककर अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी जा पहुँचे। जब विश्वयुद्ध दक्षिण-पूर्व एशिया में उग्र हो उठा और अंग्रेज जापानियों से हारने लगे, तो सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से जापान होते हुए सिंगापुर पहुँच गए तथा आजाद हिंद आंदोलन के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिये। उन्हें ‘नेताजी’ के संबोधन से पुकारा जाने लगा। आजादहिंद आंदोलन के प्रमुख अंग थे—आजाद हिंद संघ, आजाद हिंद सरकार, आजाद हिंद फौज, रानी झाँसी रेजीमेंट, बाल सेना, आजाद हिंद बैंक और आजाद हिंद रेडियो।
आजाद हिंद फौज ने कई लड़ाइयों में अंग्रेजी सेनाओं को परास्त किया तथा मणिपुर एवं कोहिमा क्षेत्रों तक पहुँचने और भारतभूमि पर तिरंगा झंडा फहराने में सफलता प्राप्त की।

नेताजी सुभाष के विषय में सुना गया कि मोरचा बदलने के क्रम में विमान दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण 18 अगस्त 1945 को फारमोसा द्वीप के ताइहोकू स्थान पर उनकी मृत्यु हो गई। यह बात कांग्रेस कह रही है जबकी हकीकत कुछ आैर है।
आखिर  क्या वजह थी कि सुभाष चंद्र बोस को इतिहास से गायब कर दिया गया -
नेहरू-गांधी-ब्रिटिश की तिकड़ी ने देश को सही मायने में आजादी दिलाने वाले इस सच्‍चे देशभक्त को हमारी नजर से ओझल कर दिया। कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में जब सुभाष के खिलाफ गांधी ने पटटाभि सितारमैया को खड़ा किया, उसी वक्‍त स्पष्ट हो गया कि आजादी पाने का यह दो रास्ते है। सुभाष अध्यक्ष पद पर जीत कर यह स्थापित करने में कामयाब रहे कि उनका रास्ता ही सर्वमान्य रास्ता है, लेकिन अहिंसक गांधी के अहंकार को इस लोकतांत्रिक निर्णय से जबरदस्त धक्का लगा था। केवल गांधी के अहंकार को शांत करने के लिए सुभाष बाबू ने अध्यक्ष पद छोड़ा। सही मायने में सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्ष पद पर जीत हो या फिर बाद में सरदार पटेल की जीत–  दोनों बार गांधी ने लोकतंत्र का गला दबाया–  पहली बार सुभाष को हराने के लिए सर्वसम्मति का रास्ता त्याग कर और दूसरी बार नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने के लिए।
यह सुभाष बाबू का भय था जिसके कारण गांधी को 1942 में अंग्रेजों भारत छोडो का नारा देना पडा था और वह आंदोलन भी पूरी तरह से फलॉप हुआ था। सोच कर देखिए न कि यदि गांधी का वह आंदोलन सफल रहता तो अंग्रेजी उसी साल भारत से विदा हो जाते न कि पांच साल तक इंतजार करते रहते। 
द्वितीय विश्व युद्ध में भारत के अंदर सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिश की दुर्गति कर दी थी। यदि कुछ समय ब्रिटिश और रुक जाते तो भारतीय सैनिकों के हाथों अंग्रेजों का पराजित होना निश्चित था और इसी पराजय को डालने के लिए गांधी-नेहरू का उपयोग सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ किया गया।

गांधी को  राष्ट्रपिता किसने आैर किस आधार पर  बनाया ?
गांधी को राष्ट्रपिता कहना देश राष्ट्र का अपमान नहीं तो और क्या है।
मेरा विनम्र  निवेदन है कि इस विषय में सोचे ............
पढे







13 June 2017

जम्मू-कश्मीर में अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए अब्दुल्ला परिवार किसी भी हद तक जा सकता है। देश के नेताआें ने क्या किया

अब्दुल्ला परिवार चुनाव जीतने के लिए अच्छी तरह जानता था कि ऐसा यह तभी संभव हो सकता है, जब आतंकियों की भाषा में बात की जाए। इसके लिए ..

नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुखिया अपना और अपनी पार्टी का रुख स्पष्ट करने में जुट गए जिसके साक्ष्य - 
  • पिता-पुत्र मतदान से चार दिन पहले चुनाव प्रचार के दौरान श्रीनगर के गली-कूचों में घोषणा कर रहे थे कि पत्थर फेंकने वाले अपने वतन कश्मीर के लिए प्राण न्योछावर कर रहे हैं
  • फारुख अब्दुल्ला ने पत्थरबाजों का हौसला बढ़ाते हुए हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री को ललकारा और कहा, ‘‘आपको कश्मीर में पर्यटकों की चिंता होगी, लेकिन हमारे नौजवानों को इसकी फिक्र नहीं है। ये भूखे रहकर जान दे सकते हैं, पर अपने वतन कश्मीर के लिए पत्थरबाजी बंद नहीं करेंगे। इन्होंने खुदा से वादा किया है कि ये अपने वतन कश्मीर को आजाद कराने के लिए प्राण तक न्योछावर कर देंगे।
  • कश्मीर के युवा अब मौत से बेपरवाह हो गए हैं। उन्होंने बंदूकें थाम ली हैं, विधायक-सांसद बनने के लिए नहीं, बल्कि कश्मीर की आजादी के लिए। साथ ही, भारत को चुनौती दी ...
  • कश्मीर हिन्दुस्थान की खानदानी जायदाद नहीं है जो वह इस पर अपना दावा ठोकता रहता है।
  • इस खानदान ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर पर भी भारत के दावे को चुनौती दी और कहा, साथ ही कहा कि हिम्मत है तो पाकिस्तान से वह इलाका छुड़ा कर दिखाओ। 
  • फारुख ने अलगाववादी नेता सैयद अहमद शाह गिलानी की गोद में बैठकर हुर्रियत की शान में कसीदे काढ़े और पार्टी के चम्मचों को हुर्रियत के साथ मिलकर चलने का आदेश भी दिया।
  • उसने सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकने वालों को ‘आजादी का योद्धा’ कहना शुरू कर दिया

अब सवाल उठता है कि -
  • क्या इन आतंकियों के साथ नेशनल कॉन्फ्रेंस की मिलीभगत है?
  • आतंकियों से संबंध के सारे साक्ष्य मौजुद होने के बाद भी आज तक जांच क्यों नहीं की गई ?
 
9 अप्रैल की घटना
उस दिन मतदान होना था और अर्द्धसैनिक बल के कुछ जवान मतदान केंद्रों की सुरक्षा में तैनात थे। 
एक मतदान केंद्र "बड़गाम जिले" पर स्थिति बिगड़ गई और स्थानीय अधिकारियों के लिए इसे संभालना मुश्किल हो गया। उग्र भीड़ ने मतदान केंद्र को घेर लिया था। पत्थरबाज वहां तैनात थे। करीब 1200 लोगों की उग्र भीड़ पेट्रोल बमों से केंद्र को जलाने की कोशिश में थी। चारों तरफ से पथराव भी हो रहा था। वहां मौजूद कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों की जान खतरे में थी। उन्हें व अन्य नागरिको को सही सलामत निकालने के लिए सेना की सहायता मांगी गई। 
असम के मेजर लीतुल गोगोई के नेतृत्व में सैनिकों की एक टुकड़ी जब तक वहां पहुंची, स्थिति गंभीर हो चुकी थी। मेजर गोगोई के सामने चुनौती की घड़ी थी मेजर गोगोई को तत्काल ऐसा रास्ता निकालना था जिससे बिना खून-खराबे के हालात पर नियंत्रण पाया जा सके।  जो कुछ करना था, उन्हें ही करना था और वह भी तत्काल। 

फारुख अब्दुल्ला अपने कार्यकर्ताओं से हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के साथ मिलकर आजादी के लिए संघर्ष करने की हिदायत दे चुका था। इसलिए पत्थरबाजों की भीड़ में उनके कार्यकर्ता कितने थे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल था। ये कार्यकर्ता दोहरी भूमिका के लिए तैयार खड़े थे। उन्हें वोट भी डालना था और पत्थर भी फेंकने थे। 
सहसा मेजर गोगोई के मन में एक विचार कौंधा। उन्होंने पत्थरबाजों को उकसा रहे एक युवक को पकड़ा, जो सेना की जीप के पास पहुंच गया था। उसका नाम फारुख अहमद डार था। हालांकि उसने भागने की कोशिश की थी। मेजर के कहने पर जवानों ने उसे पकड़कर जीप के बोनट पर बैठा दिया। ऐसा करते ही पत्थरबाजी बंद हो गई। 

सोचने लायक है एेसा क्यों हुआ -
भीड़ में से आतंकियों द्वारा गोली चलाने का खतरा भी टल गया, क्योंकि ऐसा करने से जीप पर बंधे फारुख की मौत हो सकती थी जो पत्थरबाजों की पलटन का हिस्सा था। इस तरह मेजर गोगोई ने बिना बल प्रयोग किए मतदान केंद्र से सभी को सुरक्षित निकाल लिया। 
इससे हुर्रियत कॉन्फ्रेंस, अलगाववादियों और आतंकियों की रणनीति असफल हो गई। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस, अलगाववादियों नेशनल कॉन्फ्रेंस की योजना विफल होने की बौखलाहट पर ये सभी मेजर गोगोई को इतनी आसानी से सफल कैसे होने दे सकते थे। लिहाजा, सोशल मीडिया का हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने वाली अलगाववादियों की एक ब्रिगेड सक्रिय हो गई और बोनट पर बंधे फारुख अहमद की तस्वीर वायरल कर दी गई। 

मानवाधिकार-वादियों जो की अपने आप को ज्यादा ही बुद्धिजीवी समझते है हमेशा अपराध करने वालो का साथ देना जिसकी फितरत है -

चाहे छत्तीसगढ़ के जंगलों में माओवादियों से लेकर जम्मू-कश्मीर में आतंकियों का साथ देने के लिए मानवाधिकारों की दुहाई दे कर उनकी रक्षा करना, उनके कुकृत्यों की सफाई देने और उसके औचित्य को सही ठहराने की भारी-भरकम जिम्मेदारी इनही मानवाधिकार-वादियों पर है।

पत्थरबाजों को अपना काम करते हुए कुछ हद तक खतरा भी उठाना पड़ता है। वे सुरक्षाबलों की गोली का शिकार हो सकते हैं, लेकिन मानवाधिकार ब्रिगेड के सामने ऐसा कोई खतरा नहीं होता। वे अपने काम को सुरक्षित स्थान और सुविधा सम्पन्न वातावरण में ही अंजाम देते हैं। 

इस ब्रिगेड ने अपनी रणनीति से मेजर गोगोई को घेर लिया। पुलिस ने मेजर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली। वहा रे मेरे देश का कानून मानवाधिकार-वादियों का समूह गोगोई को सजा देने की मांग करने लगा। उन्होंने नरसंहार को टाल दिया, यह बात गधे के सिर पर सींग की तरह गायब कर दी।  बोनट पर बंधे फारुख अहमद को कितनी ‘मानसिक वेदना’ हुई, इसका लेखा-जोखा पेश किया जाने लगा
मेजर गोगोई को जिम्मेदार ठहरा जा देने की मांग की  जाने लगी। 

क्या यह मानवाधिकार-वादी देशद्रोही नहीं है ? 
सरकार इन पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा रही है ?

कैसे पलीता पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लगाया  -
उन्होंने न केवल मेजर गोगोई की सराहना की, बल्कि यह भी कहा, " यदि उनके स्थान पर मैं होता तो मैं भी यही करता। आप जम्मू-कश्मीर में सेना को हाथ पीछे बांधकर आतंकवादियों से लड़ने के लिए नहीं कह सकते। "
लेकिन इस पूरी रणनीति को पलीता लग जाएगा, इसकी आशंका किसी को नहीं थी। न पत्थर ब्रिगेड को, न सोशल मीडिया ब्रिगेड और न ही मानवाधिकार ब्रिगेड को। नेशनल कॉन्फ्रेंस को ही तो बिल्कुल भी अनुमान नहीं था, क्योंकि श्रीनगर लोकसभा सीट पर वह कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ रही थी। 
कैप्टन के लेख से मानवाधिकार-वादियों की ब्रिगेड में खलबली मच गई। उन्होंने रणनीति बनाते समय इस अप्रत्याशित हमले की कल्पना तक नहीं की थी। इस नुकसान की भरपाई के लिए अब किसी रुतबे वाले व्यक्ति को उतारना जरूरी हो गया था। 
कैप्टन का मुकाबला न तो सैयद अहमद शाह गिलानी के बयानों से हो सकता था और न ही यासीन मलिक यह काम कर सकता था।
यह पलीता पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लगाया क्योंकि वह खुद देश के रक्षक रहे है

 मानवाधिकार ब्रिगेड के लिए भी संकट की घड़ी उपस्थित हो गई थी। मरता क्या न करता। परदा उठाना पड़ा और कैप्टन को जवाब देने के लिए उमर अब्दुल्ला को मैदान में उतारा गया। 
कैप्टन के आलेख के जबाब में उमर अब्दुल्ला का आलेख अखबारों में आया। उसने मेजर गोगोई पर हमला किया और फारुख अहमद पर हुए जुल्म के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया। उसके लिए मेजर गोगोई को क्या सजा दी जाए? उमर अब्दुल्ला को यह कहने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि इसकी घोषणा अखबार में नहीं, बल्कि कश्मीर घाटी की सड़कों पर पार्टी विधायक शमीमा फिरदौस के नेतृत्व में प्रदर्शन के माध्यम से मेजर गोगोई के अंत की मांग उठाकर की गई थी।      


  • कोई और देश होता तो फारुख अहमद की पृष्ठभूमि की जांच की मांग की जाती परन्तु क्यों नहीं की गई ? 
  • अलगाववादियों से उसके संबंधों पर सवाल उठते परन्तु क्यों नहीं सवाल उठे ? 

लेकिन यहां गोगोई को ही घेरा जा रहा था और फारुख को मासूम बताया जा रहा था। 

मेजर गोगोई का कहना है कि फारुख अहमद पत्थरबाजों का सरगना था और उन्हें इस काम के लिए उकसा रहा था। 

कायदे से तो इस साक्ष्य के आधार पर फारुख के खिलाफ भी मुक्दमा दर्ज होना चाहिए था परन्तु ...
इसके विपरीत मेजर गोगोई के खिलाफ पुलिस में प्राथमिकी दर्ज है। क्या कहने मेरे इस देश के नेताआें आैर उनके चम्मचों के।

उमर अब्दुल्ला और उनकी मानवाधिकार ब्रिगेड चिल्लाती रही कि मेजर गोगोई को फारुख को जीप के बोनट पर नहीं बैठाना चाहिए था, लेकिन यह नहीं बताया कि उस हालत में इसके स्थान पर क्या करना चाहिए था?    

थल सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने बिल्कुल सही प्रश्न उठाया है कि यदि सीमा पर शत्रुओं और देश के भीतर देश के खिलाफ बंदूक उठाने वालों के मन में सेना का भय नहीं रहेगा तो देश का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।   बड़गाम जिले में उस दिन यही हो रहा था।


क्या सेना इस बात की प्रतीक्षा करती कि पहले आतंकवादी गोली चलाते, फिर कुछ सैनिक मारे जाते, तब सेना सक्रिय होती?


सेना को पैलेटगन का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए भी यही मानवाधिकार ब्रिगेड उच्चतम न्यायालय तक दौड़ लगाती रहती है क्यों ?

सेना बंदूक, पैलेटगन नहीं चलाएगी तो सेना उस स्थिति में क्या आतंकियों के मनोरंजन के लिए मनोरंजक कार्यक्रमों का आयोजन करेगी?

नेशनल कॉन्फ्रेंस और पाकिस्तान, दोनों का दुर्भाग्य यह है कि दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू या उनके वंशजों की सरकार नहीं है, यदि ऐसा होता तो शायद सचमुच मेजर गोगोई को ही सजा हो जाती। 

कांग्रेस की सोच देखे -  
कांग्रेसी नेता संदीप दीक्षित ने थलसेना प्रमुख को सडक का गुण्डा कहा। बाद में देश में विरोध होने पर इस कमीने ने खेद जताने आैर अपना बयान वापस नेने के बाद कहा की यह मामला अब खत्म हो चुका है।


भाजपा नेता केन्द्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने बकायदा संवाददात सम्मेलन में दीक्षित के इस बयान पर आपत्ति कर कहा की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सामने आकर माफी मांगनी चाहिए।


किसी भी नेता के मुंह से नहीं फुटा की इसे तत्काल प्रभाव से पार्टी से निकाल देना चाहिए या इसके खिलाफ कोई मुक्दमा दर्ज करना चाहिए।।

क्योंकि नेता नेता भाई-भाई !!
यह है मेरा देश आैर इसके नेता ।।



12 June 2017

एडोल्फ हिटलर कौन थे, क्या वास्तव में हिटलर हत्यारा था ?

सवाल उठता है कि  -

  • बचपन से हम आैर आप हिटलर को खुनी और हत्यारा मान रहे है क्यों ?   क्यों की हमने आैर आपने किताबो में पढ़ा है। हमने जो इतिहास पढ़ा उसके लिखने वाले सब अंग्रेज ही थे, सो जो भी पढ़ाया वो हमने पढा उसे ही सच मान लिया। 
  • हिटलर ने किस की हत्याएं की थी ? आपको बतला दे कि हिटलर ने सिर्फ यहूदियों को मारा था, यहूदी उस समय अत्याचारी और हत्यारे थे।  परन्तु हिटलर ने जितनी भी हत्या की उससे 40 गुणा हत्या  ब्रिटिश सेना अफ्रिका महाद्वीप में कर चुकी थी।  50 गुणा हत्या अमेरिका वाले खुद अपने देश की रेड-इन्डियनस की कर चुके हैं जो अमेरिका के मूल निवासी थे। ब्रिटेन और अमेरिका जो भी गलत काम करते थे, यहूदियों की आड़ में करते थे और हिटलर ने अपने देश को बचाने के लिए ना सिर्फ मारा बल्कि जिस किसी देश में यहूदी थे वहाँ भी जाकर मारा।

मेरा मत है कि हिटलर ने हत्याए नहीं वध किया था। वध का मतलब  -   वध दुष्ट व्यक्तियों-प्राणियों का होता है। जैसे की रावण, कंस इत्यादी। 

  • क्या आपको पता है कि यहूदी ही ईसाईयों और मुसलमानों के जन्म- दाता हैं।   आज यदि जर्मनी दुनिया में एक महाशक्ति है तो हिटलर के द्वारा यहूदियों की सफाई के कारण, नहीं तो जर्मनी भी सीरिया और नाइजीरिया की तरह भूखा-नंगा सड रहा होता।
मानवता के शत्रु कहे जाने वाले हिटलर में यिद अवगुण था तो साथ ही उसकी राष्टवादी मनोवृति को भी हमे नहं भूलना चाहिए। इसी राष्टवादी धारा के प्रवाह में किस प्रकार उनकी आकांक्षा- महत्वाकांक्षा में परिवर्तित हुई इसके तथ्य माइन काम्फ हिटलर की आत्मकथा "मेंरा संघर्ष" पढने के बाद आप भी स्वयं आंकलन कर सकते है।

जब हिन्दुस्तानी क्रान्ति कारियों को कुचला जा रहा था तब गुरुड धव्जा स्वास्तिक लेकर 15 लाख अंग्रेजो का वध करने वाले सिर्फ हिटलर ही थे।द्वितीय विश्व युद्ध में सुभाष चन्द्र बॉस ने हिटलर के साथ मिलकर यदि ब्रिटेन की नीव को न हिलाई होती तो ब्रिटेन आज भी 71 देशो पर शासन कर रहा होता।

इनका मै सम्मान करता हूं।

पढने वालो से सवाल -

  1. विश्वयुद्ध में अंग्रेजों को हराने के लिए "सुभाष चन्द्र बोस" और उनकी "आजाद हिन्द फ़ौज" द्वारा हिटलर का साथ देने को आप सही मानते हैं या फिर गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी द्वारा अंग्रेजों का साथ देने को ?

गाँधी के कहने पर अंग्रेजो की ओर से लड़ने वाले और आजाद हिद फ़ौज के स्वाधीनता सेनानियों को मारने वाले सैनिक गद्दार माने जाते हैं। क्यों ?   जबकी ज्ञात है कि गांधी का आन्दोलन तो 1942 में ही असफल साबित हो गया था।

आज हमारा देश आजाद है तो इसमें बहुत बड़ा हाथ "हिटलर" का भी है। हिटलर विश्वयुद्ध भले ही हार गया था मगर उसने अंग्रेजों की कमर तोड़कर रख दी थी। 
इतिहास गवाह है कि विश्वयुद्ध में इंग्लैण्ड की बर्बादी और आजाद हिन्द फ़ौज की बहादुरी ने अंग्रेजों को भागने पर मजबूर किया था।

उस समय हमारा दुर्भाग्य ये रहा कि - हमे कहा गया के आज़ादी मिल गई लेकिन सम्पूर्ण आज़ादी नहीं मिली अंग्रेंज तो यहाँ से चले गये मगर उनके द्वारा भारतीयों को लूटने के लिये बनाई व्यवस्था आज भी वैसे की वैसे ही चल रही है।

अडोल्फ हिटलर को विश्व मानवता का शत्रु समझने वाले लोगों के लिए ‘माइन काम्फ’ हिटलर की आत्मकथा ‘मेरा संघर्ष’ एक ऐसी ख्याति प्राप्त ऐतिहासिक ग्रन्थ है, जिसके अध्ययन से न केवल जर्मनी की पीड़ा, बल्कि हिटलर की पीड़ित मानसिकता में उसकी राष्ट्रवादी मनोवृत्ती का भी अनुभव होगा। साथ ही राजनीतिज्ञों के चरित्र, राजनीति के स्वरूप, भाग्य-प्रकृति, शिक्षा सदनों का महत्त्व, मानवीय मूल्यों तथा राष्ट्रवादी भावना की महानता के आधार की भी प्रेरणा मिलेगी। 

सर्वविदित है कि कोई भी इंसान बुरा नहीं होता, बुराई इंसान की सोच के आधार पर ही विकसित होती है। विश्व मानवता के शत्रु कहे जाने वाले हिटलर में यदि अवगुण थे, तो ध्यान रहे, यह उसकी विश्व-विजेता बनने की महत्त्वाकांक्षा थी। साथ ही उसकी राष्ट्रवादी मनोवृत्ति को भी हमें नहीं भूलना चाहिए। इसी राष्ट्रवादी धारा के प्रवाह में किस प्रकार उसकी आकांक्षा-महत्त्वकांक्षा में परिवर्तित हुई, जिसके पठ्न-पाठ्न से आप स्वयं ही आंकलन कर सकते हैं।

 क्या आज केवल दिखावटी नारे बोल के देश को विश्व शक्ति बनायेंगें ................ ??

मारी जमीन चीन ने छिन ली क्या कर लिया। एक अदना सा पाकिस्तान जिसने जीना हराम कर रखा है क्या कर लिया।  हमारे नेता सिर्फ आैर सिर्फ बाते ही करते रहते है। देश को बेवकुफ बना रखा है दिखावटी नारे बोल कर। यह कब जागेगे पता नहीं।।

क्या निरंतर प्रचार के जरिए, लोगों को स्वर्ग भी नर्क की तरह दिखाया जा सकता है या एक बिल्कुल मनहूस जीवन को स्वर्ग की तरह दिखाया जा सकता है ??

आप सोचे की क्या आज यही हो रहा है या नहीं ?
आप ही सोचे क्या हिटलर सही थे या गलत ? 
सही थे तो दुष्प्रचार क्यों किया गया ?




कैसे कहु वो भारत देश है मेरा या सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा

’’ जहां डाल-डाल पर सोने की चिडिया करती है बसेरा
जहां सत्य , अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
जहां आसमा से बाते करते मंदिर और शिवाले
जहा किसी नगर में किसी द्वारा पर कोई न ताला डाले
प्रेम की बंसी जहां बजाता हे ये शाम सवेरा
’’ वो भारत देश है मेरा ’’
परन्तु ....... आज   कैसे कहु सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा
’वीराना कर दिया मेरे देश के गदारों ने इस चमन को
कैसे रक्षा करेगा हर नौजवान हमारा इसकी
कैसे कहुं सारे जांह से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा॥’’
 
सारे जहां से अच्छा इंडिया हमारा
हम भेड-बकरी इसके यह गवारिया हमारा
सत्ता की खुमारी में आजादी से सो रहे
हडताल क्यों है इसकी पडताल हो रही
लेकर के कर्ज खाओं यह फर्ज है तुम्हारा
चोरो व धूसखोरों पर नोट है बरसते
ईमान के मुसाफिर राशन को है तरसते
वोटर से झूठे वादे कर वोट लेकर कर गए वो किनारा
जब राष्ट्रीय पूंजी पर वे डालते है डाका
फिर भी कहते इनकम बहुत कम है होता नहीं गुजारा
इस लिए सारे जहा से अच्छा इंण्डिया हमारा॥

जहां वोट बैंक के खातिर अधिकार छीने जाते है -
  • जहां योग्यता पर खंजर चले,  ’आरक्षण’ की कैची  से
  • जहां डाल-डाल पात-पात भ्रष्टाचार है।
  • जहां हर और फैली हो गंदगी ।
  • जहां सरकार द्वारा आम आदमी को कैसे लुटना है तरकीबे बनाई जाती हो।
  • जहा न्याय पाने के लिए तरसना पडता है।
  • जहा अपने लालच के लिए हरे भरे पेडों को काट जहरीली गैसे लेने के लिए मजुबर किया जाता हो। 
  • जहां लच्छेदार भाषण दे धोखा करते आमजन से।
  • जहां देश पर कुर्बान होने वालो के साथ न्याय न होता हो।

कैसे कहुॅ मेरा भारत महान ?
कैसे कहु सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्ता हमारा ?

01 May 2017

अहिंसा क्या है, उसका सच्चा अर्थ क्या है हमारे ग्रंथो में अंहिसा के बारे में क्या बतलाया है

कभी कभी मै सोचता था कि ” हिन्दु “सनातन धर्म इतना महान और शक्तीशाली था कि पूरे विश्व में उसका डंका बजता था फिर क्या हुआ कि सनातन धर्म ” हिन्दु “ का इतना पतन (नुकसान या हानि ) हो गया क्या कारण था ?
अंहिसा परमो धर्मः ” श्लोक का प्रचार-प्रसार किया और इस अधूरे श्लोक ने सनातन धर्म ” हिन्दु ” का ” सत्यानाश ” कर डाला। अधूरे श्लोक का परिणाम ये निकला कि ” हिन्दुओं “ने अपने शस्त्र छोड दिए ” शस्त्र विद्या ” का अभ्यास छोड दिया।
"अहिंसा परमो धर्मः "  
अर्थात अंहिसा ही परम धर्म है।  
इसी अधूरे श्लोक ” अंहिसा परमों धर्मः ” का उपयोग गाॅधी ने किया और भारत के क्रांतीकारी वीरों को दोषी बतला अंग्रेजों को बचाया।
यह अधुरा  श्लोक ही बतलाया गया। जिससे इस पूरे श्लोक का अर्थ ही बदल गया।  जबकी यह पूरा श्लोक इस प्रकार है - 

" अहिंसा परमो धर्मः 
धर्म हिंसा तथैव च:।। "
अर्थात - अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है और धर्म रक्षार्थ हिंसा भी उसी प्रकार श्रेष्ठ है।

इस श्लोक को गांधी हिन्दु सभा में अधूरा ही पढ़ता था जिससे हिन्दुओ का धार्मिक खून उबल न पड़े। जिससे मुस्लिमों को बचाया जा सके। 
सब जानते है कि गांधी मुस्लिमों के पक्ष में था। गांधी वध के कारणों में एक सबसे बडा कारण भी यही था। जिसकी सच्चाई आज सबके सामने आ चुकी है।

आज भी हमारे हिन्दुस्तान में हिंदू विरोधी सरकारे हिन्दुओ को आधा ही श्लोक बताने की शौकीन हैं.. 
स्पष्ट कारण है हिन्दुओ का शोषण जरी रखा जा सके।

अहिंसा का सच्चा अर्थ गीता में जो कहा गया है -

गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम्।
आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।।

अर्थात् : " ऐसे आततायी या दुष्ट मनुष्य को अवश्य मार डालें; किंतु यह विचार न करें कि वह गुरु है, बूढ़ा है, बालक है या विद्वान ब्राह्मण है। " 

शास्त्रकार कहते हैं कि ऐसे समय हत्या करने का पाप हत्या करने वाले को नहीं लगता, किन्तु आततायी मनुष्य अपने अधर्म से ही मारा जाता है। 
आत्मरक्षा का यह हक कुछ मर्यादा के भीतर आधुनिक फ़ौजदारी क़ानून में भी स्वीकृत किया गया है। ऐसे मौकों पर अहिंसा से आत्मरक्षा की योग्यता अधिक मानी जाती है।

आपातकाल में तो 'प्राणस्यान्नमिदं सर्वम्' यह नियम सिर्फ़ स्मृतिकारों ही ने नहीं कहा है; किन्तु उपनिषदों में भी स्पष्ट कहा है।

सूक्ष्मयोनीनि भूतानि तर्कगम्यानि कानिचित्।
पक्ष्मणोऽपि निपातेन येषां स्यात् स्कन्धपर्ययः।।

अर्थात् - " इस जगत में ऐसे–ऐसे सूक्ष्म जन्तु हैं कि जिनका अस्तित्व यद्यपि नेत्रों से देख नहीं पड़ता तथापि तर्क से सिद्ध है; ऐसे जन्तु इतने हैं कि यदि हम अपनी आँखों की पलक हिलाएं तो उतने से ही उन जन्तुओं का नाश हो जाता है।" 
आज के आधुनिक युग में मोटरसाईकल, कार, बसे, ए.सी, काम में ली जा रही है इनके इंजन से नि कलने वाली तीव्र गर्मी से न जाने कितने जीव मर रहे है।
ऐसी अवस्था में यदि हम मुख से कहते रहें कि 'हिंसा मत करो, हिंसा मत करो' तो उससे क्या लाभ होगा ?

अहिंसा का सच्चा तत्त्व जो समझ में आता है -

"जीवो जीवस्य जीवनम्"  
इस जगत में कौन किसको नहीं खाता ? 
यही नियम सर्वत्र देख पड़ता है। 

आपातकाल में तो  "प्राणस्यान्नमिदं सर्वम्"  यह नियम सिर्फ़ स्मृतिकारों ही ने नहीं कहा है, किन्तु उपनिषदों में भी स्पष्ट कहा है - 

यदि सब लोग हिंसा छोड़ दें तो क्षात्र धर्म कहाँ और कैसे रहेगा ? 
यदि क्षात्र धर्म नष्ट हो जाए तो प्रजा की रक्षा कैसे होगी ? 
सारांश यह है कि नीति के सामान्य नियमों से ही सदा काम नहीं चलता; नीतिशास्त्र के प्रधान नियम– 
अहिंसा में भी कर्त्तव्य–अकर्त्तव्य का सूक्ष्म विचार करना ही पड़ता है।
  
अहिंसा धर्म के साथ क्षमा, दया, शान्ति आदि गुण शास्त्रों आदि में कहे गए हैं परन्तु ....
सब समय शान्ति से कैसे काम चल सकेगा? 

सदा शान्त रहने वाले मनुष्यों के बाल–बच्चों को भी दुष्ट लोग हरण किए बिना नहीं रहेंगे, उनको जब चाहे मार देगे, सम्पति छिन लेगे। इसी कारण का प्रथम उल्लेख करके प्रह्लाद ने अपने नाती, राजा बलि से कहा है–
"न श्रेयः सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा।
इति तात विजानीहि द्वयमेतदसंशयम् ।।"

"अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहार्देन न विद्विषादरः।"

अर्थात् - जिस मनुष्य को अपमानित होने पर भी क्रोध नहीं आता उसकी मित्रता और द्वेष दोनों ही बराबर हैं।' 

क्षात्रधर्म के अनुसार देखा जाए तो बिदुला ने यही कहा है किः–

"एतावानेव पुरुषो यदमर्षी यदक्षमी।
क्षमावान्निरमर्षश्च नैव स्त्री न पुनः पुमान्।।"

अर्थात् - जिस मनुष्य को (अन्याय पर) क्रोध आता है और जो (अपमान को) सह नहीं सकता, वही पुरुष कहलाता है। जिस मनुष्य में क्रोध या चिढ़ नहीं है वह नपुंसक ही के समान है।'

मेंरे  कहने का तात्पर्य इतना ही है कि - 
इस अधुरे श्लोक ” अंहिसा परमो धर्मः ” 
का उपयोग छोडो और जागो और धर्म की रक्षा के लिऐ शस्त्र उठाओ।।

28 April 2017

शास्त्रों में " वर्ण " शब्द तो है लेकिन " जाति " नहीं ! महत्वपूर्ण जानकारी

हिन्दुस्तान में ऋषियों द्वारा लिखे गए धर्म शास्त्रों में समाज को ब्राह्राण , क्षत्रिय , वैशय , शुद्र वर्णो में विभाजित किया।

वर्ण का अर्थ क्या है -
वर्ण व्यवस्था "हिन्दू धर्म" में प्राचीन काल से चले आ रहे समाजिक गठन का अंग है, जिसमें विभिन्न लोगों के आध्यात्मिक विवेक के आधार पर काम निर्धारित होता था।

वर्ण शब्द ‘वृज’ वरणे से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है वरण अथवा चुनाव करना।  
आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश के अनुसार-‘‘-रंग, रोगन, -रंग,रूप, सौन्दर्य, -मनुष्यश्रेणी, जनजातिया कबीला, जाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तथा शूद्र वर्ण के लोग )’’  
इस प्रकार, व्यक्ति अपने कर्म तथा स्वभाव के आधार पर जिस व्यवस्था का चुनाव करता है, वही वर्ण कहलाता है।

वेद, उपनिषद्, महाभारत, गीता, मनुस्मृति तथा अन्य धर्म-ग्रन्थों में वर्ण व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा की गई है, जाति कि नहीं,  हमारे ग्रंथो के अनुसार जो जैसा कर्म करता है वह उस जाति का माना जाता है। 
गुण, कर्म आैर स्वभाव के कारण मनुष्य-मनुष्य में भेद हो सकता है पर किसी कुल में जन्म लेने से नहीं।
गीता के शलोक 4/13 में श्रीकृष्ण कहते है कि -
 चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।13।। "
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान ।।13।।

गीता के श्लोक 18/41 में - 
 ब्राम्हण क्षत्रिय विन्षा शुद्राणच परतपः। 
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभाव प्रभवे गुणिः ॥  
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के द्वारा विभक्त किये गये हैं ।।41।।
        
गीता के श्लोक 18/42 में -  
पूर्व श्लोक में की हुई प्रस्तावना के अनुसार पहले ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं-

" शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्राकर्म स्वभावजम् ।।42।। "
अन्तकरण का निग्रह करना; इन्द्रियाँ का दमन करना; धर्मपालन के लिये कष्ट सहना , बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इन्द्रिय और शरीर को सरल रखना,  वेद शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना ये सब के सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ।।42।।

गीता के श्लोक 18/43 में - 
ब्राह्मणों के स्वाभाविक कर्म बताकर अब क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं-
" शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ।।43।। "
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव – ये सब के सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ।।43।।

गीता के श्लोक 18/44 में - 
क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्मों का वर्णन करके अब वैश्य और शूद्रों के स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं-
" कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ।।44।। "
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार- ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है ।।44।।

इन सभी में व्यवसाय आैर स्वभाव के अनुसार ही वर्ण विभाजन की बात कही गई है। इसमें किसी जाति में जन्म के कारण ऊँच-नीच होने कि कोई भी बात नहीं लिखी है।

सभी मनुष्य एक ही प्रकार से पैदा होते हैं ।।
सभी की एक सी इन्द्रियाँ हैं ।।
इसलिए जन्म से जाति मानना उचित नहीं हैं ।।

यजुर्वेद के ३१वें अध्याय में वर्णों की उत्पत्ति के संबन्ध् में कहा गया है कि-
‘‘ब्राह्मण वर्ण विराट पुरुष अर्थात् परमात्मा के मुख के समान हैं, क्षत्रिय उसकी भुजाये हैं, वैश्य उसकी जंघाएं अथवा उदर हैं और शूद्र उसके पांव हैं।’’ 

इसी तरह ऋगवेद मंडल-१०, सूक्त-९०, मंत्र-१२ लिखा है कि-

‘‘ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहूराजन्यः कृतः। 
‘‘ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।’’ 

यहाँ ब्राह्मण की उत्पत्ति विराट् पुरुष के मुख से हुई है ऐसा कहने का अभिप्राय ब्राह्मण शरीर में मुखवत् सर्वश्रेष्ठ है। अतएव ब्राह्मणों का कार्य समाज में बोलना तथा अध्यापकों और गुरुओं की तरह अन्य वर्णस्थ स्त्री-पुरुषों को शिक्षित करना है। 

इसी प्रकार भुजाएं शक्ति की प्रतीक हैं, इसलिए क्षत्रियों का कार्य शासन-संचालन एवं शस्त्र धारण करके समाज से अन्याय को मिटाकर लोगों की रक्षा करना है। 
इसीलिए श्रीराम ने वनवासी तपस्वियों के सम्मुख प्रतिज्ञा की थी कि-‘‘निशिरहीन करूं मही भुज उठाय प्रण कीन्ह’ ’वाल्मीकि ने लिखा है-  ‘‘क्षत्रियाः धनुर्संध् त्ते क्वचित् आर्त्तनादो न भवेदिति’’   अर्थात् क्षत्रिय लोग अपने हाथ में इसीलिए धनुष धारण करते हैं कि कहीं पर किसी का भी दुःखी स्वर न सुनाई दे। 

जघांएं बलिष्ठता एवं पुष्टता की प्रतीक मानी जाती हैं, अतएव समाज में वैश्यों का कार्य कृषि तथा व्यापार आदि के द्वारा धन संग्रह करके लोगों की उदर पूर्ति करना और समाज से पूरी तरह अभाव को मिटा देना है। 

शूद्र की उत्पत्ति उस विराट् पुरुष के पैरों से मानी गयी है अर्थात् पैरों की तरह तीनों वर्णों के सेवा का भार अपने कंधे पर वहन करना है। 

वर्ण विभाजन को शरीर के अंगों को माध्यम से समझाने का उद्देश्य उसकी उपयोगिता या महत्व बताना है न कि किसी एक को श्रेष्ठ अथवा दूसरे को निकृष्ट।

मनुष्य जाति के दो भेद हैं। वे हैं पुरुष और स्त्री।

हमारे संविधान में कहीं नहीं लिखा भ्रष्ट तरीके अपना कर या निजी स्वार्थ से प्रेरीत हो कर अपनी अयोग्य संतानों को आगे बढाएं।

जन्मना वर्ण व्यवस्था को सत्य माना जाए तो समाज कुंठाग्रस्त होकर ही मर जाएगा ।।

जन्मना वर्ण व्यवस्था के आधार पर ब्राहमण ही रहेगा और शूद्र भी शूद्र। किसी को अपनी प्रोन्नति करने का कोई अवसर ही प्राप्त न होगा।

ब्राहमण नीच कर्मों में प्रवृत्त भी ब्राहमण ही होकर रहेगा और शूद्र धर्माचरण करता हुआ भी शूद्र।। 

यह  अत्याचार नहीं तो आैर क्या है ? 


मनुस्मृति में कहा गया है –


शूद्रो ब्राहमणतामेति ब्राहमणश्चैति शुद्रताम्।

क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यास्तथैव च।। (10:65)
गुण कर्मों के आधार पर शूद्र भी ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य हो सकता है। इसी प्रकार अन्य वर्णों को भी समझना चाहिये।   

असली मनुस्मृति में 630 श्लोक थे, 2400 श्लोक कैसे हो गए,सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए किसने मिलावट की ? 
चीन की  दीवार से प्राप्त हुयी पांडुलिपि में ‘पवित्र मनुस्मृति’ का जिक्र, सही मनुस्मृति में 630 श्लोक ही थे,,मिलावटी मनुस्मृति में अब श्लोकों की संख्या 2400 हो गयी।  जब चीन की इस प्राचीन पांडुलिपी में मनुस्मृति में 630 श्लोक बताया है तो आज 2400 श्लोक कैसे हो गयें ? इससे यह स्पष्ट होता है कि, बाद में मनुस्मृति में जानबूझकर षड्यंत्र के तहत अनर्गल तथ्य जोड़े गये जिसका मकसद महान सनातन धर्म को बदनाम करना व फूट डालना था।

जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते। 
अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं।

अंग्रेजों के शासनकाल में ब्रिटिश थिंक टैंक द्वारा करवाई गयीं जिसका लक्ष्य भारतीय समाज को बांटना था। 

यह ठीक वैसे ही किया ब्रिटिशों ने जैसे भारत में मैकाले ब्रांड शिक्षा प्रणाली लागू की थी। ब्रिटिशों द्वारा करवाई गयी मिलावट काफी विकृत फैलाई।
सच का सामना
जाति-आधारित जनगणना, ब्रिटिश राज में हिन्दुआें को तोडने के लिए की गई थी । जिसे आज हमारे नेता अपना उल्लु सीधा करने के लिए काम में ले रहे है।

कोई भी शक की गुंजाईश नहीं है कि स्वार्थी लोगों की वज़ह से ही दुष्टता से भरी इस जाति-प्रथा को मजबूती मिली।  इन सबके बावजूद जाति-प्रथा की नींव और पुष्टि हमेशा से ही पूर्णरूप से गलत है।

सबसे पहले हम जातिगत जनगणना के औचित्य या अनौचित्य पर विचार करें - 
यह सही है कि धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र में जाति के लिए कोई स्थान नहीं है हमारे संविधान-निर्माताओं ने जाति को संविधान में कोई स्थान न देकर बिल्कुल ठीक किया।

परंतु यथार्थ क्या है? 
जमीनी हकीकत क्या है? 
यथार्थ यह है कि हमारा समाज अनेक वर्गों और श्रेणियों में विभाजित हो गया है।

गणित शास्त्र में यह बात स्वयंसिद्ध् मानी गई है, कि- 

विषम में सम जोड़ने से विषम उत्पन्न होता है। यथा- ७, ९, ११ आदि विषम संख्याएं हैं।

इस में २,२ जोड़ने से ७+२:९, ९+२:११, ११+२:१३ होते हैं। इसी तरह यदि विषम को सम बनाना हो तो उसमें विषम अंक तोड़ना पडेगा। 

जैसे- ७+३: १०, ७+९: १६, ११+५: १६;। 

आश्चर्य है कि समाजशास्त्रा के आधुनिक पंडित  यानि आजके नेता सुप्रीम कोर्ट में बैठे अपने आप को न्यायाधिश विद्धवान कहने वाले सामाजिक संगठन के समय पर इस स्वयं सिद्ध को भूल गए हैं।


हमारे देश में चुनाव भी जातिगत आधार पर लड़े जाते हैं। चुनावों में जाति और साम्प्रदायिकता के कार्ड जम कर खेले जाते हैं। यहां तक कि टिकिट भी जाति के आधार पर बांटे जाते हैं।

जाती प्रथा की सच्चाई
कर्म से वर्ण या जाति व्यवस्था ! जन्म से वर्ण नहीं, प्राचीन काल में जब बालक समिधा हाथ में लेकर पहली बार गुरुकुल जाता था तो कर्म से वर्ण का निर्धारण होता था, यानि के बालक के कर्म गुण स्वभाव को परख कर गुरुकुल में गुरु बालक का वर्ण निर्धारण करते थे ! यदि ज्ञानी बुद्धिमान है तो ब्राह्मण, यदि निडर बलशाली है तो क्षत्रिय, आदि ! यानि के एक ब्राह्मण के घर शूद्र और एक शूद्र के यहाँ ब्राह्मण का जन्म हो सकता था ! लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवस्था लोप हो गयी और जन्म से वर्ण व्यवस्था आ गयी, और हिन्दू धर्म का पतन प्रारम्भ हो गया !

 उपरोक्त विवेचना एवं विभिन्न प्रामाणिक ग्रन्थों के स्पष्ट एवं मजबूत प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि वर्णव्यवस्था जन्मना न होकर कर्मणा ही श्रेयस्कर एवं न्यायपूर्ण है। इसी के आधार पर हमें अपने वर्ण का चयन करना चाहिए, तभी एक सुव्यवस्थित समाज एवं राष्ट का विकासपूर्ण ढाँचा तैयार होगा।

क्या हिन्दुआें को इस तरह से साजिश के तहत नहीं बाटा गया ?
अब समय आ गया है कि हिन्दुआें को एक जुट होना होगा नहीं तो समाज में बटा हिन्दु एक दिन रोने को मजबुर हो जाएगा।।।