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25 March 2015

चौरीचौरा काण्ड

चौरी चौराउत्तर प्रदेश में गोरखपुर के पास का एक कस्बा है जहाँ 4 फ़रवरी 1922 को भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार की एक पुलिस चौकी को आग लगा दी थी जिससे उसमें छुपे हुए 22 पुलिस कर्मचारी जिन्दा जल के मर गए थे। इस घटना को चौरीचौरा काण्ड के नाम से जाना जाता है। 
इसके परिणामस्वरूप गांधी ने कहा था कि हिंसा होने के कारण असहयोग आन्दोलन उपयुक्त नहीं रह गया है और उसे वापस ले लिया था।
इस घटना के तुरन्त बाद गांधी ने असहयोग आन्दोलन को समाप्त करने की घोषणा कर दी। बहुत से लोगों को गांधी का यह निर्णय उचित नहीं लगा। विशेषकर क्रांतिकारियों ने इसका प्रत्यक्ष या परोक्ष विरोध किया।गया कांग्रेस में रामप्रसाद बिस्मिल और उनके नौजवान सहयोगियों ने गांधीजी का विरोध किया। १९२२ की गया कांग्रेस में खन्नाजी ने व उनके साथियों ने बिस्मिल के साथ कन्धे से कन्धा भिड़ाकर गांधी का ऐसा विरोध किया कि कांग्रेस में फिर दो विचारधारायें बन गयीं - एक उदारवादी या लिबरल और दूसरी विद्रोही या रिबेलियन। गांधी विद्रोही विचारधारा के नवयुवकों को कांग्रेस की आम सभाओं में विरोध करने के कारण हमेशा हुल्लड़बाज कहा करते थे।

यह  काण्ड क्यों हुआ  .........

चौरी चौरा कांड  उपद्रव नहीं किसान प्रतिरोध था पुलिस थाने हमेशा ही जनता के दमन की प्रतीक रहे हैं। भारत में फैले ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अंग्रेजों द्वारा स्थापित थाने दमनकारी भूमिका निभाते थे। ये थाने ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी और जनविरोधी नीतियों को जनता के ऊपर जोर.जबरदस्ती से लागू करवाने में बहुत ही अहम भूमिका निभाते थे। उन्हें ही सबसे पहले जनता के गुस्से का भी शिकार बनना पड़ता था। 4 फरवरी 1922 को गोरखपुर के चौरी चौरा में यही हुआ जब अंग्रेजों के जुल्म से तंग आकर आक्रोशित किसानों ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए ;दमन के प्रतीकद्ध चौरी चौरा थाने को फूंक दियाए जिसमें 22 पुलिस कर्मी मारे गए।

गांधी के असहयोग आंदोलन के दौरान कार्यकर्ता शांतिपूर्वक जनता को जागरूक कर रहे थे। इस दरमियान   
1 फरवरी 1922 को चौरीचौरा थाने के एक दरोगा ने असहयोग आंदोलन के कार्यकर्ताओं की जमकर पिटाई कर दी। इस घटना पर अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए लोगों का एक जुलूस चौरी चौरा थाने पहुंचा। इसी दरमियान पीछे से पुलिस कर्मियों ने सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज तथा गोलियां चलाई। जिसमें 260 व्यक्तियों की मौत हो गई। हर तरफ खून से सने शव बिखरे पड़े थे। इसी के बाद क्रांतिकारी किसानों ने वह कियाए जिसे इतिहास में चौरी चौरा कांड के नाम से जाना जाता है।

इसमें क्या हुआ ..........

चौरी चौरा कांड में कुल 172 व्यक्तियों को फांसी की हुई। अदालत के इस निर्णय के विरुद्ध पंडित मदनमोहन मालवीय  ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील की। मालवीय जी की जोरदार अपीलों के चलते 38 व्यक्ति बरी हुएए 14 को फांसी की जगह आजीवन कारावास हुआए जबकि 19 व्यक्तियों की फांसी बरकरार रही। बाकी सत्याग्रहियों को तीन से लेकर आठ साल की सजा मिली। कुल मिलाकर मालवीय जी फांसी के सजा पाए 170 लोगों में से 151 को छुड़ाने में सफल रहे।

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