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28 April 2017

शास्त्रों में " वर्ण " शब्द तो है लेकिन " जाति " नहीं ! महत्वपूर्ण जानकारी

हिन्दुस्तान में ऋषियों द्वारा लिखे गए धर्म शास्त्रों में समाज को ब्राह्राण , क्षत्रिय , वैशय , शुद्र वर्णो में विभाजित किया।

वर्ण का अर्थ क्या है -
वर्ण व्यवस्था "हिन्दू धर्म" में प्राचीन काल से चले आ रहे समाजिक गठन का अंग है, जिसमें विभिन्न लोगों के आध्यात्मिक विवेक के आधार पर काम निर्धारित होता था।

वर्ण शब्द ‘वृज’ वरणे से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है वरण अथवा चुनाव करना।  
आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश के अनुसार-‘‘-रंग, रोगन, -रंग,रूप, सौन्दर्य, -मनुष्यश्रेणी, जनजातिया कबीला, जाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तथा शूद्र वर्ण के लोग )’’  
इस प्रकार, व्यक्ति अपने कर्म तथा स्वभाव के आधार पर जिस व्यवस्था का चुनाव करता है, वही वर्ण कहलाता है।

वेद, उपनिषद्, महाभारत, गीता, मनुस्मृति तथा अन्य धर्म-ग्रन्थों में वर्ण व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा की गई है, जाति कि नहीं,  हमारे ग्रंथो के अनुसार जो जैसा कर्म करता है वह उस जाति का माना जाता है। 
गुण, कर्म आैर स्वभाव के कारण मनुष्य-मनुष्य में भेद हो सकता है पर किसी कुल में जन्म लेने से नहीं।
गीता के शलोक 4/13 में श्रीकृष्ण कहते है कि -
 चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ।।13।। "
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान ।।13।।

गीता के श्लोक 18/41 में - 
 ब्राम्हण क्षत्रिय विन्षा शुद्राणच परतपः। 
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभाव प्रभवे गुणिः ॥  
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के द्वारा विभक्त किये गये हैं ।।41।।
        
गीता के श्लोक 18/42 में -  
पूर्व श्लोक में की हुई प्रस्तावना के अनुसार पहले ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं-

" शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्राकर्म स्वभावजम् ।।42।। "
अन्तकरण का निग्रह करना; इन्द्रियाँ का दमन करना; धर्मपालन के लिये कष्ट सहना , बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इन्द्रिय और शरीर को सरल रखना,  वेद शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना ये सब के सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ।।42।।

गीता के श्लोक 18/43 में - 
ब्राह्मणों के स्वाभाविक कर्म बताकर अब क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं-
" शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ।।43।। "
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव – ये सब के सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ।।43।।

गीता के श्लोक 18/44 में - 
क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्मों का वर्णन करके अब वैश्य और शूद्रों के स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं-
" कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ।।44।। "
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार- ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है ।।44।।

इन सभी में व्यवसाय आैर स्वभाव के अनुसार ही वर्ण विभाजन की बात कही गई है। इसमें किसी जाति में जन्म के कारण ऊँच-नीच होने कि कोई भी बात नहीं लिखी है।

सभी मनुष्य एक ही प्रकार से पैदा होते हैं ।।
सभी की एक सी इन्द्रियाँ हैं ।।
इसलिए जन्म से जाति मानना उचित नहीं हैं ।।

यजुर्वेद के ३१वें अध्याय में वर्णों की उत्पत्ति के संबन्ध् में कहा गया है कि-
‘‘ब्राह्मण वर्ण विराट पुरुष अर्थात् परमात्मा के मुख के समान हैं, क्षत्रिय उसकी भुजाये हैं, वैश्य उसकी जंघाएं अथवा उदर हैं और शूद्र उसके पांव हैं।’’ 

इसी तरह ऋगवेद मंडल-१०, सूक्त-९०, मंत्र-१२ लिखा है कि-

‘‘ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहूराजन्यः कृतः। 
‘‘ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।’’ 

यहाँ ब्राह्मण की उत्पत्ति विराट् पुरुष के मुख से हुई है ऐसा कहने का अभिप्राय ब्राह्मण शरीर में मुखवत् सर्वश्रेष्ठ है। अतएव ब्राह्मणों का कार्य समाज में बोलना तथा अध्यापकों और गुरुओं की तरह अन्य वर्णस्थ स्त्री-पुरुषों को शिक्षित करना है। 

इसी प्रकार भुजाएं शक्ति की प्रतीक हैं, इसलिए क्षत्रियों का कार्य शासन-संचालन एवं शस्त्र धारण करके समाज से अन्याय को मिटाकर लोगों की रक्षा करना है। 
इसीलिए श्रीराम ने वनवासी तपस्वियों के सम्मुख प्रतिज्ञा की थी कि-‘‘निशिरहीन करूं मही भुज उठाय प्रण कीन्ह’ ’वाल्मीकि ने लिखा है-  ‘‘क्षत्रियाः धनुर्संध् त्ते क्वचित् आर्त्तनादो न भवेदिति’’   अर्थात् क्षत्रिय लोग अपने हाथ में इसीलिए धनुष धारण करते हैं कि कहीं पर किसी का भी दुःखी स्वर न सुनाई दे। 

जघांएं बलिष्ठता एवं पुष्टता की प्रतीक मानी जाती हैं, अतएव समाज में वैश्यों का कार्य कृषि तथा व्यापार आदि के द्वारा धन संग्रह करके लोगों की उदर पूर्ति करना और समाज से पूरी तरह अभाव को मिटा देना है। 

शूद्र की उत्पत्ति उस विराट् पुरुष के पैरों से मानी गयी है अर्थात् पैरों की तरह तीनों वर्णों के सेवा का भार अपने कंधे पर वहन करना है। 

वर्ण विभाजन को शरीर के अंगों को माध्यम से समझाने का उद्देश्य उसकी उपयोगिता या महत्व बताना है न कि किसी एक को श्रेष्ठ अथवा दूसरे को निकृष्ट।

मनुष्य जाति के दो भेद हैं। वे हैं पुरुष और स्त्री।

हमारे संविधान में कहीं नहीं लिखा भ्रष्ट तरीके अपना कर या निजी स्वार्थ से प्रेरीत हो कर अपनी अयोग्य संतानों को आगे बढाएं।

जन्मना वर्ण व्यवस्था को सत्य माना जाए तो समाज कुंठाग्रस्त होकर ही मर जाएगा ।।

जन्मना वर्ण व्यवस्था के आधार पर ब्राहमण ही रहेगा और शूद्र भी शूद्र। किसी को अपनी प्रोन्नति करने का कोई अवसर ही प्राप्त न होगा।

ब्राहमण नीच कर्मों में प्रवृत्त भी ब्राहमण ही होकर रहेगा और शूद्र धर्माचरण करता हुआ भी शूद्र।। 

यह  अत्याचार नहीं तो आैर क्या है ? 


मनुस्मृति में कहा गया है –


शूद्रो ब्राहमणतामेति ब्राहमणश्चैति शुद्रताम्।

क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यास्तथैव च।। (10:65)
गुण कर्मों के आधार पर शूद्र भी ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य हो सकता है। इसी प्रकार अन्य वर्णों को भी समझना चाहिये।   

असली मनुस्मृति में 630 श्लोक थे, 2400 श्लोक कैसे हो गए,सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए किसने मिलावट की ? 
चीन की  दीवार से प्राप्त हुयी पांडुलिपि में ‘पवित्र मनुस्मृति’ का जिक्र, सही मनुस्मृति में 630 श्लोक ही थे,,मिलावटी मनुस्मृति में अब श्लोकों की संख्या 2400 हो गयी।  जब चीन की इस प्राचीन पांडुलिपी में मनुस्मृति में 630 श्लोक बताया है तो आज 2400 श्लोक कैसे हो गयें ? इससे यह स्पष्ट होता है कि, बाद में मनुस्मृति में जानबूझकर षड्यंत्र के तहत अनर्गल तथ्य जोड़े गये जिसका मकसद महान सनातन धर्म को बदनाम करना व फूट डालना था।

जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते। 
अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं।

अंग्रेजों के शासनकाल में ब्रिटिश थिंक टैंक द्वारा करवाई गयीं जिसका लक्ष्य भारतीय समाज को बांटना था। 

यह ठीक वैसे ही किया ब्रिटिशों ने जैसे भारत में मैकाले ब्रांड शिक्षा प्रणाली लागू की थी। ब्रिटिशों द्वारा करवाई गयी मिलावट काफी विकृत फैलाई।
सच का सामना
जाति-आधारित जनगणना, ब्रिटिश राज में हिन्दुआें को तोडने के लिए की गई थी । जिसे आज हमारे नेता अपना उल्लु सीधा करने के लिए काम में ले रहे है।

कोई भी शक की गुंजाईश नहीं है कि स्वार्थी लोगों की वज़ह से ही दुष्टता से भरी इस जाति-प्रथा को मजबूती मिली।  इन सबके बावजूद जाति-प्रथा की नींव और पुष्टि हमेशा से ही पूर्णरूप से गलत है।

सबसे पहले हम जातिगत जनगणना के औचित्य या अनौचित्य पर विचार करें - 
यह सही है कि धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र में जाति के लिए कोई स्थान नहीं है हमारे संविधान-निर्माताओं ने जाति को संविधान में कोई स्थान न देकर बिल्कुल ठीक किया।

परंतु यथार्थ क्या है? 
जमीनी हकीकत क्या है? 
यथार्थ यह है कि हमारा समाज अनेक वर्गों और श्रेणियों में विभाजित हो गया है।

गणित शास्त्र में यह बात स्वयंसिद्ध् मानी गई है, कि- 

विषम में सम जोड़ने से विषम उत्पन्न होता है। यथा- ७, ९, ११ आदि विषम संख्याएं हैं।

इस में २,२ जोड़ने से ७+२:९, ९+२:११, ११+२:१३ होते हैं। इसी तरह यदि विषम को सम बनाना हो तो उसमें विषम अंक तोड़ना पडेगा। 

जैसे- ७+३: १०, ७+९: १६, ११+५: १६;। 

आश्चर्य है कि समाजशास्त्रा के आधुनिक पंडित  यानि आजके नेता सुप्रीम कोर्ट में बैठे अपने आप को न्यायाधिश विद्धवान कहने वाले सामाजिक संगठन के समय पर इस स्वयं सिद्ध को भूल गए हैं।


हमारे देश में चुनाव भी जातिगत आधार पर लड़े जाते हैं। चुनावों में जाति और साम्प्रदायिकता के कार्ड जम कर खेले जाते हैं। यहां तक कि टिकिट भी जाति के आधार पर बांटे जाते हैं।

जाती प्रथा की सच्चाई
कर्म से वर्ण या जाति व्यवस्था ! जन्म से वर्ण नहीं, प्राचीन काल में जब बालक समिधा हाथ में लेकर पहली बार गुरुकुल जाता था तो कर्म से वर्ण का निर्धारण होता था, यानि के बालक के कर्म गुण स्वभाव को परख कर गुरुकुल में गुरु बालक का वर्ण निर्धारण करते थे ! यदि ज्ञानी बुद्धिमान है तो ब्राह्मण, यदि निडर बलशाली है तो क्षत्रिय, आदि ! यानि के एक ब्राह्मण के घर शूद्र और एक शूद्र के यहाँ ब्राह्मण का जन्म हो सकता था ! लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवस्था लोप हो गयी और जन्म से वर्ण व्यवस्था आ गयी, और हिन्दू धर्म का पतन प्रारम्भ हो गया !

 उपरोक्त विवेचना एवं विभिन्न प्रामाणिक ग्रन्थों के स्पष्ट एवं मजबूत प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि वर्णव्यवस्था जन्मना न होकर कर्मणा ही श्रेयस्कर एवं न्यायपूर्ण है। इसी के आधार पर हमें अपने वर्ण का चयन करना चाहिए, तभी एक सुव्यवस्थित समाज एवं राष्ट का विकासपूर्ण ढाँचा तैयार होगा।

क्या हिन्दुआें को इस तरह से साजिश के तहत नहीं बाटा गया ?
अब समय आ गया है कि हिन्दुआें को एक जुट होना होगा नहीं तो समाज में बटा हिन्दु एक दिन रोने को मजबुर हो जाएगा।।।

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