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07 March 2015

गेम्बलिंग एक्ट 1867 के बाद भी - वायदा बाजार मतलब सट्टेबाजी मतलब महगाई .

    "  सुप्त खडी संवेदना , फर्ज खडा मौन ।
             घायल तडपे सडक पे , उसे उठाये कौन ।।
                                      से प्रेरित हो कर यह लेख आपके समक्ष है।

" वायदा बाजार मतलब सट्टेबाजी " से हिन्दूस्तान के आम व्यक्तियों को हो रहे नुकसान एंव भारतीय रुपये की गिरती साख !
            
हमारा समाज जो कभी जुआ और सट्टे के धिक्कारता था , महाभारत जैसे ग्रन्थ की रचना जुए के कारण ही हुई ग्रन्थ जो समाज को जुए जैसी बुराई से दूर रहने कि शिक्षा देता है परन्तु आज ..........

भारत में जुआ पब्लिक गेम्बलिंग एक्ट 1867 के तहत प्रतिबंधित है फिर भी सट्टा हिन्दुस्तान की आवाम पर भारी पड रहा है , अफसोस की बात है इन सरकारों की भूमिका पर भले ही हिन्दुस्तान का सर्वनाश हो जाये। एक्ट होने के बाद भी कुछ प्रभावशली लोगो को फायदा पहुचाने के लिए इसमें गली निकाल कर वैध बना दिया गया।   

(Environment: Indian courts and legislations have always considered gambling to be a pernicious and immoral activity. The Courts have on various occasions held that gambling and lotteries of any form causes grave economic harm to the public which leads to the loss of the common man’s hard-earned money. Thus, the attitude of the judiciary and law-makers has been to ‘discourage people from indulging in games of chance and probability.)


सरकारे इस बुराई को रोकने के लिए एंव आवाम को राहत पहुचाने के लिए सख्ती नहीं करती कानून जरुर बना देती है, जिसमें उनका फायदा हो ।
सट्टा उस पर सरकार तय ही नहीं कर पा रही के अच्छा है या बुरा तभी तो वह खुद कानूनन वायदा बाजार जिससे हर आवाम को नुकसान है बनाती है।   लाटरी चलाती है और दूसरी तरफ क्रिकेट के सट्टेबाजों को या अन्य सटोरीयों को गिरफ्तार करती है।  क्योंकि वहा से कोई कमाई सरकार को नहीं आती है।

वायदा बाजार क्या है :  
भविष्य में किसी वस्तु की होने वाली कीमत का अनुमान लगाकर उसकी खरीद व बिक्री का अग्रिम अनुबंध करना व निर्धारित समय पर वस्तु की आपूर्ति का व्यवसाय वायदा कारोबार है।
  • वायदा बाजार का उदय 1950-1960 में हुआ था।
  • 1970 में वायदा कारोबार पर रोक लगा दी गई।
  • परन्तु न जाने क्या हुआ 1980 में वायदा का नई वस्तुओं के साथ वापस उदय हुआ।
  • 1999 में खाद्ध तेल और बीजों का वायदा चालु हुआ।
  • 2003 में सभी कमोडिटी में वायदा शुरु कर दिया गया।  और उसके बाद से महगाई चरम सीमा को छु गई।

मात्र चन्द लोगो ने अपने स्वार्थ के लिए देशवासियों से गदारी कर यह कह कर हिन्दुस्तान की आवाम को बेवकुफ बनाया, वायदा बाजार को प्रारम्भ करने के पीछे किसानों के हित की जो अवधारणा बतलाई गई थी वह कही भी नजर नहीं आती है।

अगर वायदा बाजार को जल्द ही प्रतिबंधित नहीं किया गया तो पूरे हिन्दुस्तान को सट्टेबाजी ले डूबेगी यह निशचित है।

पहले बाजार को उत्पादक और उपभोक्ता संभालते थे लेकिन बाद में उसमें दलालों और व्यापारियों ने धुसपैठ की जिससे महगाई चरम को छुने लगी दलालों और व्यपारियों ने अपनी जेबे भरी और आम आदमी को मारना शुरु कर दिया था। 
और अब सरकार की कृपा से उसमें सटेबाजी ने धुसपैठ कर ली है मूलभूत व्यवसाय छोडकर हिन्दुस्तान को गर्त में पहुचाने का व्यवसाय शुरु हो गया है खाने पीने की वस्तुए , कच्चा तेल , सोना , चांदी , डालर , ऐसी चीजे है जो आज सट्टेबाजों के कब्जे में है,   सट्टेबाज मनमाने ढग से हर सेकण्ड, हर मिनट हर धण्टे भावो में उतार चढाव का खेल कर रहे है।
जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता खो गई है,  अर्थव्यवस्था से भारी खिलवाड चल रहा है भारत सरकार चुपचाप देख रही है, इन हालात को देखते हुए सरकारों पर कतई भी भरोसा नहीं किया जा सकता है। 

आम आदमी जानता है की ये कितने धुर्त किस्म के लोग है परन्तु बेबस है आम हिन्दुस्तानी कुछ नहीं कर पाते है।  जबकि सरकार चलाने वालो को और हिन्दुस्तान के आम आदमी को पता है कि वायदा कारोबार पर अगर अंकुश लगाया जाए तो सारी जरुरी चीजों की कीमते एक दम नीचे आ जाएगी।  
हमारे प्रधानमंत्री जी और वित्तमंत्री जी बोलते रहते है की महगाई पर अकुंश लगाने का प्रयास किया जा रहा है लेकिन जानबूझ इस विषय पर अपने स्वार्थ से वंशीभूत कुछ नहीं कहते है। 

सट्टेबाजों ने ग्वार की कीमत 30 हजार रु/क्विंटल तक पहुचा दी थी फिर न जाने क्या हुआ की सरकार ने ग्वार के वायदे बाजार पर पांबदी लगा दी।   

जब सट्टे का शिकंजा टूटा तो ग्वार की कीमत पांच गुना कम हो गई। इसके बाद भी सरकार ध्यान नहीं दे रही है  कि सट्टे बाजी के कारण ही देश में खाने पीने की एंव अन्य चीजे महंगी हुई है एंव हिन्दुस्तान की आवाम महगांई से त्रस्त हो गई है। स्पष्ट है सरकार के कुछ प्रभावशाली इसमें लिप्त है।

अभी जो पर्यावरणीय संकट हम देख रहे है इसके पीछे मुख्य कारण वायदा बाजार ही है क्योकि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में चन्द कम्पनियो और उनके शेयर होल्डर के हाथों सब कुछ बेचा जा रहा है। भारत में शेयर बाजार पूरी तरह से एक केसिनों बन गया है ।
  
हर साल देश में 125 लाख करोड का वायदा कारोबार होता है।  हिन्दुस्तान की कुल आबादी में 4 फीसद लोग सट्टे के खेल में लाभ कूट रहे है और बाकी 96 फीसद आबादी इसके परिणाम भुगत रही है।

संयुक्त राष्ट्रसंध की भोजन अधिकार सम्बंधी रिपोर्ट भी बताती है कि अंतरराष्ट्रीय अनाज बाजार में दामों से 40 फीसदी वृद्धी सट्टे के कारण हुई है।

इसी तरह सोने के दाम को बढाने में चीन-अमरीका का हाथ रहा।  क्योकि पुरी दुनिया को मालुम है की हिन्दोस्तानी सोने चांदी का दिवाना है। 
चीन-अमरीका ने मिलकर गोल्ड के सट्टे को अपने हाथ में ले लिया।  तब भी वायदा बाजार के बनाये फर्जी विशेषज्ञ हमेशा राय यही देते है कि सोने की आपूर्ति कम मांग ज्यादा है। समझने की बात है कि जब इसका उपयोग ही नहीं है तो इतनी मांग कहा से आई जाहिर है कि यह मांग सिर्फ निवेशकों की है। 

ये अर्थ युद्ध का ही नतीजा है। भारत इसकी गिरफ्त में कुछ दबंग लोगो की वजह से आ गया।

इसका सटीक उदाहरण है रुपया।  रुपये का भाव 66-67 प्रति डालर चला गया। 1947 में रुपया और डालर बराबर थ। लेकिन 67 साल में सोचने की बात है कि या तो हम 67 गुणा गिरे है या अमरीका 67 गुणा बढा है।

ऐसा अमरीका ने क्या किया कि वो इतना उपर चला गया ?
  
मतलब साफ है कि यह सब कुछ अर्थ युद्ध से जुडा हुआ है, और हिन्दुस्तान की जनता के साथ अन्याय किया जा रहा है । 

एक बयान में बदल जाती है किस्मत :  

वायदा बाजार में छोटी बडी धटना का सीधा असर पडता है जैसे कही तुफान आया बारीश ज्यादा हो गई तो नुकसान का जायजा तो बाद में आता है पर बाजार में असर पहले दिखता है वायदा बाजार उपभोक्ता मामलात मंत्रालय के तहत आता है, लेकिन कोई भी मंत्री इससे संम्बंधित बयान देता है तो असर सीधा दिखाई देता है। भले ही वह बयान बाद में गलत साबित हो जाए। 

कहा से चल रहा है ये इसका बहुत बडा है ये दायरा :  

ये कभी पता नहीं चलता कि किस स्तर पर सट्टा लग रहा है और कहा से मैनेज हो रहा है। भारत के एक्सचेंज से पूछें कि भाव क्यों बढे है तो उनका जवाब ये होता है कि हम तो लंदन बाजार के दर्पण मात्र है। भारतीय लोग और विदेशी लोगो का इससे आंतरिक गठजोड रहता है जैसे कच्चे तेल के दाम ओपेक से तय होते है। फिर सट्टेबाज दाम की हवा बनाने लगते है। 

सटटे की कारस्तानी :  

करेंसी की बात है तो बढते सट्टे की बजह से एक दिन में करंसी में तीन फीसदी तक का बदलाव आने लगा है एक देश की स्थिति इतनी खराब नहीं होती कि एक दिन में तो रुपया 69 का स्तर छू जाये और एक दिन में ही ऐसा क्या सुधार हो जाए की वह वापस 66 पर आ जाए मतलब साफ है कि सटटे की कारस्तानी से यह सब होता है। 
कोई भी बता सकता है कि रुपये में किसी हद तक सट्टा धुसा हुआ है वित्त मंत्री कहते है कि रुपया स्वंय अपने स्थान पर आ जायेगा लेकिन किस स्तर पर आ जाएगा वे यह नहीं बताते। सटटे की वजह से कीमते काबू में नहीं रहती है। 
चिदरम्बरम और प्रधानमंत्री ने कहा था  सोना मत खरीदिये लेकिन तीन महीने में सोने की कीमत 10 हजार तक बढ गई सोना खरीने वाले अपने आप को ठगा सा महसूस कर करने लगे। 

वायदा बजार से कौन कौन से मंत्री या उनके रिशतेदार या साथी जुडे है मालुम करने के लिए जांच करवाई जानी आवशयक है।   जिससे की पता चल सके की यह सब कहा से हो रहा है। इसमें कही देश को एंव उसमें रहने वाले हर आदमी को बर्बाद करने की कोई साजिश तो नहीं।

हिन्दुस्तानीयों की भलाई के लिए वायदा बाजार जो की महंगाई के लिए सबसे धातक चीज है।  देश से वायदा को बाहर निकाल देने में ही हर हिन्दुस्तानी की भलाई है। 

अतः इस पर गौर  कर हिन्दुस्तान के आम आदमी को महंगाई को भगाने के लिए वायदा बाजार जैसे को हटाने के लिए सरकार पर दबाव बनाना होगा। जबही हमें इस मंहगाई से मुक्त हो सकेगे।

इन नेताआें के लिए एक कवि ने कहा है -

" दगा करे एक बार जो, उसको सगा न मान ।
  आदत से मजबूर ये, होते एेसे इंसान ।।

सच यही है  - 
 आगे आप के अपने विचार

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