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15 March 2015

देशभक्ति के लिये मदरसों को कांग्रेस की रिश्वत

देशभक्ति के लिये मदरसों को कांग्रेस की रिश्वत

सब ने जो देशभक्त थे सोचा था कि उप्र, गुजरात, हिमाचल में जूते खाने के बाद कांग्रेस को अक्ल आ गई होगी, लेकिन नहीं… बरसों की गन्दी आदतें जल्दी नहीं बदलतीं 31 दिसम्बर के “टाइम्स ऑफ़ इंडिया” और “रेडिफ़.कॉम” की इस खबर के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने फ़ैसला किया है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में अब से मदरसों में 15 अगस्त और 26 जनवरी को तिरंगा फ़हराने पर उन्हें विशेष अनुदान दिया जायेगा अब इस घृणित निर्णय के पीछे कांग्रेस की वही साठ साल पुरानी मानसिकता है या कुछ और कहना मुश्किल है, लेकिन इस निर्णय ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं…

  1. क्या तिरंगा फ़हराना धर्म आधारित है या देशभक्ति आधारित?
  2. क्या मदरसों में तिरंगा फ़हराने के लिये इस प्रकार की रिश्वत जायज है?
  3. 11 वीं पंचवर्षीय योजना से इस प्रकार का विशेष अनुदान देना क्या ईमानदार आयकर-दाताओं के साथ   विश्वासघात नहीं है?
  4. क्या एक तरह से कांग्रेस यह स्वीकार नहीं कर चुकी, कि मदरसों में तिरंगा नहीं फ़हराया जाता? और वहा देशभक्त तैयार नहीं किये जा रहे? लेकिन इसके लिये दण्ड की बजाय पुरस्कार क्यों?
  5. क्या अब कांग्रेस  इतनी गिर गई है कि देशभक्ति “खरीदने”  के लिये उसे “रिश्वत” का सहारा लेना पड़ रहा  है?


इन सब प्रश्नों के बाद अब ज्यादा कुछ कहने को नहीं रह जाता, सिवाय इसके कि  कांग्रेस को  विभिन्न विधानसभाओं और फ़िर आने वाले लोकसभा चुनाव में भी “सबक” सिखाना ही पड़ेगा… वो सबक मिला कि हर जगह पर काग्रेंस का दिया ही बुझ गया।

 इस फ़ैसले के पहले भी “बबुआ” प्रधानमंत्री, बजट में अल्पसंख्यकों के लिये 15% आरक्षित करने का संकल्प ले चुके हैं, यानी उस 15% से जो सड़क बनेगी उस पर सिर्फ़ अल्पसंख्यक ही चलेगा, या उस 15% से जो बाँध बनेगा उससे बाकी लोगों को पानी नहीं मिलेगा… 

पता नहीं ऐसे फ़ैसलों से कांग्रेस क्या साबित करना चाहती है, लेकिन यह बात पक्की है कि ऐसे नेहरू (जो केरल के मन्दिर में धोती बाँधने के आग्रह पर आगबबूला होते थे, लेकिन अजमेर में खुशी-खुशी टोपी पहनते थे) या फ़िर वह नेहरू जिन्होंने आजादी के वक्त एकमात्र रियासत “कश्मीर” को समझाने का काम हाथ में लिया था और सरदार पटेल को बाकी चार सौ रियासतें संभालने को कहा था… 

इतिहास गवाह है कि नेहरू से एक रियासत तक ठीक से “हैण्डल” नहीं हो सकी  या शायद जानबूझकर नहीं की… उन्हीं नेहरु की संताने देश को बाँटने के अपने खेल में सतत लगी हुई हैं… 

यदि जनता अब भी नहीं जागी तो पहले असम सहित उत्तर-पूर्व फ़िर कश्मीर और आधा पश्चिम बंगाल भारत से अलग होते देर नहीं लगेगी…

जयहिन्द

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