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08 April 2015

यहूदी धर्म

यहूदी धर्म इस्राइल और हिबूभाषियों का राजधर्म है और पवित्र ग्रंथ तनख है जो बाईबल का प्राचीन भाग माना जाता है।
धर्मिक पैग़म्बरी मान्यता मानने वाले धर्म इस्लाम और ईसाई धर्म का आधार इसी परम्परा और विचारधारा को माना जाता है। इस धर्म में एक ईश्वरवाद और ईश्वर के दूत यानि पैगम्बर की मान्यता प्रधान है। अपने लिखित इतिहास की वजह से ये कम से कम 3000 साल पुराना माना जाता है।

बाबिल यानि बेबीलोन के निर्वासन से लौटकर इजरायली जाति मुख्य रुप से येरुसलेम तथा उसके आसपास के ’ यूदा ’ नामक प्रदेश में बस गई थी, इस कारण इजरायलियों के इस समय के धार्मिक एंव सामाजिक संगठन को यूदावाद यूदाइज़्म  कहते है।

उस समय येरुसलेम का मंदिर यहूदी धर्म का केन्द्र बना और यहूदियों को मसीह के आगमन की आशा बनी रहती थी। निर्वासन के पूर्व से ही तथा निर्वासन के समय में भी यशयाह, जेरैमिया, यहेजकेल और दानिएल नामक नबी इस यूदावाद की नीव डाल रहे थे। वे यहूदियों को याहवे के विशुद्ध एक ईश्वर वाद धर्म का उपदेशा दिया करते थे और सिखलाते थे कि निर्वासन के बाद जो यहूदी फिलिस्तीन लौटेगे वे नए जोश से ईश्वर के नियमों पर चलेगे और मसीह का राज्य तैयार करेगे।

निर्वासन के बाद एज्रा, नैहेमिया, आगे, जाकारिया और मलाकिया इस धार्मिक नवजागरण के नेता बने। 537 ईसा पूर्व में बाबिल से जा पहला काफिला येरुसलेम लौटा उसमें यूदावंश के 40,000 लोग थे उन्होने मंदिर तथा प्राचीर का जीर्णेद्वार किया। बाद में और भी काफिले लौटे। यूदा के वे इजरायली अपने को ईश्वर की प्रजा समझने लगे। बहुत से यहूदी जो बाबिल में धनी बन गए थे वही रह गए किंतु बाबिल तथा अन्य देशो के प्रवासी यहूदियों का वास्तविक केंद्र येरुसलेम ही बना और यदा के यहूदी अपनी जाति के नेता माने जाने लगे।

किसी भी प्रकार की मूर्तिपूजा का तीव्र विरोध तथा अन्य धर्मो के साथ समन्वय से धृणा यूदावाद की मुख्य विशेषता है। उस समय यहूदियों का कोई राजा नहीं होता था और प्रधान याजक धर्मिक समुदाय पर शासन करते थे क्योंकि वास्तव में ईश्वर ही यहूदियों का राजा था और बाईबिल में संगृहीत मूसा संहिता समस्त जाति के धार्मिक एवं नागरिक जीवन का संविधान बन गई गैर यहूदी इस शर्त पर इस समुदाय के सदस्य बन सकते थे कि वे ईश्वर का धर्म तथा मूसा की संहिता स्वीकार करे।

यूदावाद अंतियोकुस चतुर्थ 175-164 ईसा पूर्व तक शांतिपूर्वक बना रहा किंतु इस राजा ने उस पर यूनानी संस्कृति लादने का प्रयत्न किया जिसे फलस्वरुप मक्काबियों के नेतृत्व में यहूदियों ने उनका विरोध किया था।
मान्यता  
यहूदी मान्यताओं के अनुसार ईश्वर एक है और उसके अवतार या स्वरुप नहीं है लेकिन वो दूत से अपने संदेश भेजता है।  ईसाई और इस्लाम धर्म भी इन्ही मान्यताओं पर आधारित है पर इस्लाम में ईश्वर के निराकार होने पर अधिक जोर डाला गया है। यहूदियों के अनुसार मूसा को ईश्वर का संदेश दुनिया में फेलाने के लिए मिला था जो लिखित तथा मौखिक रुपों में था।

धर्मग्रन्थ  यहूदी धर्मग्रन्थ इब्रानी भाषा में लिखा गया तनख है, जो असल में ईसाइयों की बाइबल का पूर्वार्ध है इसे पुराना नियम कहते है।
सन्देश वाहक:

  • मूसा
  • इब्राहिम यहूदी, मुसलमान और ईसाई तीनों धर्मो के पितामह माने जाते है।
  • नूह ने ईश्वर के आदेष पर महाप्रलय के समय बहु बडी किशती बनायी थी और उसमें सृष्टि को बचाया, जैसा कि राजा मनु ने किया था (हिन्दू मान्यतानुसार)

यहुदी मत के अनुसार यहूदी मृत्यु कि दुनिया में उतना ध्यान नहीं देते। जो भी हो उनके हिसाब से सभी मनुष्यों को यहूदी होना जरुरी नहीं है बाकी धर्मावलम्बी भी कयामत के बाद स्वर्ग जायेगे।

सिद्धान्त
बाइबिल के पूर्वार्ध में जिस धर्म और दर्शन का प्रतिपादन किया गया हे वह निम्न मौलिक सिद्धान्तों पर आधारित है - 

  • ईश्वर को छोडकर और कोई देवता नहीं है। ईश्वर इजरायल तथा अन्य देशों पर शासन करता है और वह इतिहास तथा पृथ्वी कि धटनाओं का सूत्रधार है।
  • वह पवित्र है और अपने भक्तो से यह मांग करता है कि पाप से बचकर पवित्र जीवन बिताए।
  • ईश्वर एक न्यायी एंव निष्पक्ष न्यायकर्ता है जो कूकर्मियों को दंड और भले लोगो को इनाम देता है। वह दयालु भी है और पशचाताप करने पर पापियों को क्षमा प्रदान करता है, इस कारण उसे पिता कि संज्ञा दी जा सकती है।
  • ईश्वर उस जाति कि रक्षा करता है जो उसकी सहायता मांगती है।
  • यहूदियों ने ईश्वर के नाम रखे थे:  एलोहीम ,  याहवे और  अदोनाई
  • इतिहास में ईश्वर ने अपने को अब्राहम तथा उसके महान वंशजों पर प्रकट किया है। उनको सिखलाया है कि वह स्वर्ग , पृथ्वी तथा सभी चीजो का सृष्टिकर्ता है। सृष्टि ईश्वर का कोई रुपांतर नहीं है क्योकि ईश्वर की सत्ता सृष्टि से सर्वथा भिन्न है। इस लोक में ईश्वर ने अपनी इच्छाशक्ति द्वारा सभी चीजों को रचा है। यहूदी लोग सृष्टिकर्ता और सृष्टि इन दोनो को सर्वथा भिन्न समझते है।
  • समस्त मानव जाति काी मुक्ति हेतु अपना विधान प्रकट करने के लिए ईश्वर ने यहूदी जाति को चुन लिया है। यह जाति अब्राहम से प्रारम्भ हुई थी और मूसा के समय ईश्वर तथा यहूदी जाति के बीच का व्यवस्थान संपन्न हुआ था।
  • मीसह का भावी आगमन यहूदी जाति के ऐतिहासिक विकास की पराकाष्ठा होगी। मसीह समस्त पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य सुस्थापित करेगे और मसीह के द्वारा ईश्वर यहूदी जाति के प्रति अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेगा। किन्तु बाईबिल में इसका कही भी स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है कि मसीह कब और कहा प्रकट होने वाले है।
  • मूसा संहिता यहूदियो के आचरण तथा उनके कर्मकांड का मापदंड था किन्तु उनके इतिहास में ऐसा समय भी आया जब वे सूसा संहिता के नियामें की उपेक्षा करने लगे। ईश्वर तथा उसने नियमों के प्रति यहूदियों के इस विशवासधात के कारण उनको बाबिल के निर्वासन का दंड भोगना पडा। उस समय भी बहु से यहूदी प्रार्थना , उपवास तथा परोपकार द्वारा अपनी सच्ची ईश्वर भक्ति प्रमाणित करते थे।
  • यहूदी धर्म की उपासना येरुसलेम के महामंदिर में केंद्रभूत थी। उस मंदिर की सेवा  के लिये याजकों का श्रेणीबद्ध संगठन किया गया था। इस महामंदिर में ईश्वर विशेष रुप से विद्यमान है यह यहूदियों का दृढ विशवास था और वे सब उस मंदिर की तीर्थयात्रा करना चाहते थे।
  • प्रारम्भ से ही कुछ यहूदियों और बाद में मुसलमानो ने बाइबिल के पूर्वार्ध में प्रतिपादित धर्म तथा दर्शन व्याख्या अपने ढंग से की है। ईसाइयों का विशवास है कि ईसा ही बाइबिल में प्रतिज्ञात मसीह है किंतु ईसा के समय में बहुत से यहूदियों ने ईसा को अस्वीकार कर दिया आजकल भी यहूदी धर्मावलंबी सच्चे मसीह की राह देख रहे है।

त्यौहार

  • योम किपुर
  • शुक्कोह
  • हुनक्का
  • पूरीम
  • रोशन-शनाह
  • पास ओवर


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