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31 March 2015

वंदे मातरम

जन्म २७ जून १८३८  निधन अप्रैल १८९४ 
वन्‍दे मातरम गीत   बंकिम चन्‍द्र चटर्जी  द्वारा संस्‍कृत में रचा गया है।   यह स्‍वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत बना था ...  यह गीत रविवार, कार्तिक सुदी नवमी, शके 1797 यानी 7नवम्बर1875 को पूरा हुआ।
सन् 1870-80 के दशक में ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोह में ’ गॉड सेव द क्वीन ’ गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस आदेश से बंकिमचन्द्र चटर्जी जो उन दिनों एक सरकारी अधिकारी डिप्टी कलेक्टर थे बहुत ठेस पहुची और उन्होने 1876 में विकल्प के तौर पर नये गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया - वन्दे मातरम्। शुरुआत में इसके दो ही पद रचे गये थे जो संस्कृत में थे। इन दोनों पदों में केवल मातृभूमि की वन्दना थी। 1882 में जब आन्नद मठ उपन्यास लिखा तब मातृभूमि के प्रेम से ओतप्रात इस गीत को भी उसमें शामिल कर लिया। 

अंग्रेजी शासन के जुल्म व प्राकृतिक प्रकोप में मर रही जनता को जागृत करने हेतु अचानक उठ खडे हुए सन्यासी विद्रोह पर आधारित था। इस तथ्यात्मक इतिहास का उल्लेख बंकिम बाबू ने आनन्द मठ के तीसरे संस्करण में स्वंय कर दिया था। और मजे की बात है कि सारे तथ्य अंग्रजी विद्धान ग्लेन व हझटर की पुस्तकों से दिये थे। उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम का एक सन्यासी गाता है। 

बाद वाले सभी पदों में मातृभूमि की दुर्गा के रुप में स्तुति की गई है। पहले वाले पद संस्कृत में है किन्तु बाद वाले पद उपन्यास की मूल भाषा बांग्ला में ही थे। 

बंगाल में चले स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह गीत लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय हो गया। ब्रिटिश सरकार इसकी लोकप्रियता से भयभीत हो गई और इस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना शुरु कर दिया। सन् 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता में हुए अधिवेशन में श्री चरणदास ने यह गीत गाया। सन्1905 में बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरलादेवी चौधरानी ने स्वर दिया। अंग्रजों की गोली का शिकार बनकर दम तोडनेवाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की जुबान पर आखिरी शब्द वन्दे मातरम् ही था।

स्वाधीनता संग्राम में इस गीत की निर्णायक भागीदारी के बावजूद जब राष्ट्रगान के चयन की बात आयी तो वन्दे मातरम् के स्थान पर सन्1911 में इंग्लैण्ड से भारत आये जार्ज पंचम की स्तुति में रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखे व गाये गये गीत जन-गण-मन को वरीयता दी गयी।

इसकी वजह यही थी कि कुछ मुसलमानों को वन्दे मातरम् गाने पर आपत्ति थी, क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रुप में देखा गया है। इसके अलावा उनका यह भी मानना था कि यह गीत जिस आनन्द मठ उपन्यास से लिया गया है वह मुसलमानों के खिलाफ लिखा गया है।

जवाहरलाल की अध्यक्षता में गठित समिति जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल था ने पाया कि इस गीत के शुरुआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गये है।

इसलिये यह निर्णय लिया गया कि इस गीत के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रुप में प्रयुक्त किया जायेगा। इस तरह रवीन्द्र नाथ टैगोर के जन-गण-मन अधिनायक जय हे को  राष्ट्रगान बना दिया गया और मोहम्मद इकबाल के कौमी तरने सारे जहॉ से अच्छा के साथ बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारम्भिक दो पदों का गीत वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत स्वीकृत हुआ।

गौर तलब बात यह है कि ईसाई लोग भी मूर्ति-पूजा नहीं करते पर इस समुदाय की ओर से इस बारे में कोई विवाद नहीं आया है।   यह विवाद राजनीतिक था मात्र वोट बैंक को बढावा देने के लिए जवाहरलाल ने एेसा किया। 
जबकी डा0 राजेन्द्र प्रसाद व अन्य सदस्य  इसके खिलाफ थे। डा0 राजेन्द्र प्रसाद का संविधान सभा को दिया गया वक्तव्य इस प्रकार है: 
’’ शब्दो व संगीत की वह रचना वन्दे मातरम् गान जिसने कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कें ऐतिहासिक भूमिका निभायी है को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले। और आशा करता हूॅ कि यह सदस्यों को सन्तुुष्ट करेगा। (भारतीय संविधान परिषद, द्वादष खण्ड, 24-1-50)

 ऐसा भी नहीं है कि भारत के सभी मुसलमानों को इस पर आपत्ति है या सब हिन्दू गाने पर जोर देते है। कुछ साल पहले विख्यात संगीतकार ए0आर0रहमान ने जो खुद एक मुसलमान है ने वन्दे मातरम् को लेकर एक संगीत एलबम तैयार किया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ। 

संस्कृत में मूल गीत:



































                                                                                                                                 इसे भी देखे

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