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26 June 2018

महामृत्युंजय मंत्र आैर मंत्र की प्रमुख जानकारी

महामृत्युंजय मंत्र "मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र है"  जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, यजुर्वेद के रूद्र अध्याय में, भगवान शिव की स्तुति हेतु की गयी वंदना है।
महामृत्युंजय मंत्र के 33 अक्षर है। जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवतआें के प्रतिक है उन तैतीस देवता में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापित व 1 षटकार है इन तैतीस कोटि "प्रकार" देवताआें की सम्पूर्ण शक्तियां महामृत्युंजय मंत्र में निहीत है।

ग्रहबाधा, ग्रहपीड़ा, रोग, जमीन-जायदाद का विवाद, हानि की सम्भावना या धन-हानि हो रही हो, वर-वधू के मेलापक दोष, घर में कलह, सजा का भय या सजा होने पर बंधन मुक्ति , कोई धार्मिक अपराध होने पर एंव अपने समस्त पापों के नाश के लिए महामृत्युंजय या लघु मृत्युंजय मंत्र का जाप किया या वेद पढे श्रेष्ठ ब्रहमणा से कराया जा सकता है। ध्यान रहे पाेंगे पण्डित से भूल कर भी जप न करवाये उससे दुष्प्रभाव पडने की अधिक संभावना है।

महा मृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धन्म। 
उर्वारुकमिव बन्धना मृत्येर्मुक्षीय मामृतात् !!

संपुटयुक्त महा मृत्‍युंजय मंत्र 
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!

लघु मृत्‍युंजय मंत्र 
ॐ जूं स माम् पालय पालय स: जूं ॐ। किसी दुसरे के लिए जप करना हो तो-ॐ जूं स (उस व्यक्ति का नाम जिसके लिए अनुष्ठान हो रहा हो) पालय पालय स: जूं ॐ !!

महा मृत्युंजय मंत्र के जप के समय इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए -
  • जाप हमेशा पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना अनिवार्य है।
  • जाप एक निर्धारित जगह पर ही करें, रोज अपनी जगह न बदलें ।
  • मंत्र का जाप करते समय धूप-दीप जलते रहना चाहिए, इस बात का विशेष ध्यान रखें।
  • रुद्राक्ष की माला पर ही यह जाप करे।
  • मंत्र का जाप सोमवार से ही किया जाना अनिवार्य है।
  • मंत्र का जाप प्रात:काल 9 बजे से पहले ही करना चाहिए अन्यथा मंत्र जाप का फल प्राप्त नहीं होता।
  • जितने भी दिन का यह जाप हो. उस समय मांसाहार बिल्कुल भी न खाएं।
  • मंत्र का जाप करते समट उच्चारण होठों से बाहर नहीं आना चाहिए. यदि इसका अभ्यास न हो तो धीमे स्वर में जप करें।
  • मंत्र का जाप संख्या का निर्धारण करना जरुरी है। जाप के समय संख्या कम नहीं होनी चाहिए।
  • मंत्र जाप के समय उबासी या आलस नहीं आना चाहिए।
  • महामृत्युंजय मन्त्र का भुल से भी अशुद्ध उच्चारण न करें और महा मृत्युंजय मन्त्र जपने के बाद में इक्कीस बार गायत्री मन्त्र का जाप करें जिससे अशुद्ध उच्चारण होने पर भी पर अनिष्ट होने का भय न रहे।
महा मृत्युंजय मंत्र का पुरश्चरण सवा लाख है और लघु मृत्युंजय मंत्र की 11 लाख है.मेरे विचार से तो कोई भी मन्त्र जपें,पुरश्चरण सवा लाख करें।

विधि
अपने घर पर महामृत्युंजय यन्त्र या किसी भी शिवलिंग का पूजन कर जप शुरू करें या फिर सुबह के समय किसी शिवमंदिर में जाकर शिवलिंग का पूजन करें और फिर घर आकर घी का दीपक जलाकर मंत्र का ११ माला जप कम से कम ९० दिन तक रोज करें या एक लाख पूरा होने तक जप करते रहें। 
अंत में हवन हो सके तो श्रेष्ठ अन्यथा २५ हजार जप और करें.

मंत्र जप के फायदे
कलौकलिमल ध्वंयस सर्वपाप हरं शिवम्।
येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।
स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।
मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।
देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत।
यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रध्दायान्वित।।
जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत्।

महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ 
हम त्रि नेत्रीय भगवान शंकर की पूजा करते है जो प्रत्येक शवास में जीवन शक्ति का संचार करते है जो जीवन की मधुर परिपुर्णता को अपनी शक्ति से पोषित कर रहे है उनसे हमारी प्रार्थना है कि जिस प्रकार एक ककडी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल रुपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है उसी प्रकार वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दे  जिससे माेक्ष की प्राप्ति हो जाए।।

मंत्र के शब्दों की स्थति -
त्रि – ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
यम – अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।
– सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
कम – जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।
– वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
– प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
हे – प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
-शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
ष्टि – अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।
– पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
र्ध – भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
नम् – कपाली रुद्र का घोतक है। उरु मूल में स्थित है।
- दिक्पति रुद्र का घोतक है। यक्ष जानु में स्थित है।
र्वा – स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।
रु – भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।
– धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
मि – अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।
– मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।
– वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।
न्धा – अंशु आदित्यद का घोतक है। वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
नात् – भगादित्यअ का बोधक है। वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
मृ – विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।
र्त्यो् – दन्दाददित्य् का बोधक है। वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
मु – पूषादित्यं का बोधक है। पृष्ठै भगा में स्थित है।
क्षी – पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है। नाभि स्थिल में स्थित है।
– त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है। गुहय भाग में स्थित है।
मां – विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
मृ – प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।
तात् – अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।

उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्तध देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं। जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग – अंग (जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं) उनकी रक्षा होती है।

मंत्रगत पदों की शक्तियाँ जिस प्रकार मंत्रा में अलग अलग वर्णो (अक्षरों) की शक्तियाँ हैं। उसी प्रकार अलग – अल पदों की भी शक्तियाँ है।

त्र्यम्‍‍बकम् – त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है जो सिर में स्थित है।
यजा- सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है।
महे- माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।
सुगन्धिम् – सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।
पुष्टि – पुरन्दिरी शकित का द्योतक है जो मुख में स्थित है।
वर्धनम – वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है।
उर्वा – ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है।
रुक – रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।
मिव रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है।
बन्धानात् – बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है।
मृत्यो: – मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।
मुक्षीय – मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है।
मा – माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है।
अमृतात – अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।

महामृत्युंजय मंत्र शोक, मृत्यु भय, अनिश्चता, रोग, दोष का प्रभाव कम करने में, पापों का सर्वनाश करने में अत्यंत लाभकारी है.महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना या करवाना सबके लिए और सदैव मंगलकारी है परन्तु देखने में आता है कि परिवार में किसी को असाध्य रोग होने पर अथवा जब किसी बड़ी बीमारी से उसके बचने की सम्भावना बहुत कम होती है, तब लोग इस मंत्र का जप अनुष्ठान कराते हैं। महामृत्युंजय मंत्र का जाप अनुष्ठान होने के बाद यदि रोगी जीवित नहीं बचता है तो लोग निराश होकर पछताने लगे हैं कि बेकार  खर्च किया।

एक बात स्पष्ट रुप जाननी चाहिए कि - इस मंत्र का मूल अर्थ ही यही है कि -
हे महादेव.. या तो रोगी को ठीक कर दो या तो फिर उसे जीवन मरण के बंधनों से मुक्त कर दो।



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