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11 April 2015

मुहम्मद

मुहम्मद  का जन्म अरब के रेगिस्तान में मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार 20 अप्रैल 571 ई. में हुआ।

इनके परिवार का मक्का के एक बड़े धार्मिक स्थल पर प्रभुत्व था। उस समय अरबी लोग मूर्तिपूजक थे (जो कि बाद मे इस्लाम में पाबंद हो गया) तथा हर कबीले का अपना देवता होता था। मक्का में काबे में इस समय लोग साल के एक दिन जमा होते थे और सामूहिक पूजन होता था। 

मुहम्मद ने ख़ादीजा नाम की एक विधवा व्यापारी के लिए काम करना आरंभ किया। बाद में उन्होंने उसी से शादी भी कर ली। सन् ६१३ में आपने लोगों को ये बताना आरंभ किया कि उन्हें परमेश्वर से यह संदेश आया है कि ईश्वर एक है और वो इन्सानों को सच्चाई तथा ईमानदारी की राह पर चलने को कहता है।  उन्होंने मूर्तिपूजा का भी विरोध किया। पर मक्का के लोगों को ये बात पसन्द नहीं आई और उन्हें सन् ६२२ में मक्का छोड़कर जाना पड़ा। 

मुस्लमान इस घटना को हिजरा कहते है और यहां से इस्लामी कैलेंडर हिजरी आरंभ होता है। अगले कुछ दिनों में मदीना में उनके कई अनुयायी बने तब उन्होंने मक्का वापसी की और मक्का के शासकों को युद्ध में हरा दिया। इसके बाद कई लोग उनके अनुयायी हो गए और उनके समर्थकों को मुसलमान कहा जाने लगा।  उस समय उनको एक अलग धर्म को रूप में न देख कर ईश्वर की एकसत्ता के समर्थक माना जाता था। इसके बाद  मुहम्मद  कई लड़ाईयाँ लड़ी जिनका उद्येश्य भटके हुये लोगो को मुसलमान बनाना था।

ज्ञान की प्राप्ति 
सन् 610 के आसपास जिब्राइल (इसाइयत में गैब्रियल, Gabriel)  से इस सच्चे ज्ञान मिला। इस बात का ज़िक्र  क़ुरान के 96वें सुरा (क़ुरान के अध्यायों को सूरा कहते हैं) की आरंभिक पाँच पंक्तियों में मिलता है। इस संदेश के अनुसार - ईश्वर (अल्लाह) एक है, जो क़यामत के दिन इस बात का निर्णय करेगा कि किसी व्यक्ति को स्वर्ग मिलेगा या नरक। इन्सान को बस उसी अल्लाह की इबादत (पूजा-आराधना) करनी चाहिये।

न् 613 के ही आसपास ही मुहम्मद  ने अपने ज्ञान प्राप्ति के बारे में लोगों को बताया और ये उपदेश देना आरंभ किया कि अल्लाह की इबादत करनी चाहिए। इबादत की विधियाँ बहुत ही सरल थीं, जैसे कि दैनिक प्रार्थना (सलत) और नैतिक सिद्धांत जैसे खैरात बाँटना और चोरी नहीं करना। 

मुहम्मद  के संदेशों का असर उन लोगों पर विशेष रूप से पड़ा जो अपने आपको धर्म से दूर पाते थे। मुहम्मद ने स्वर्ग पाने की बात कह कर कई लोगों को सच्चाई के रास्ते पर चलने को कहा। उन्होंने ये कहा कि उन्हें आस्तिकों (उम्मा) के एक ऐसे समाज की स्थापना करनी है जो सामान्य धार्मिक विश्वासों के ज़रिये आपस में जुड़े हों। जो लोग उस मार्ग पर चलते थे उन्हें मुसलमान कहा जाता था। 

इस्लाम को शुरु में सफलता समाज के ग़रीब लोगों, कमज़ोर कबीलों और संपन्न लोगों के छोटे बेटों से ही मिली। 
पर उस समय अरब के लोग मूर्तिपूजक थे तथा अलग अलग कबीले के लोग भिन्न-भिन्न देवताओं की पूजा करते थे। इसलिए समाज के समृद्ध वर्ग ने उनके एकेश्वरवाद के सिद्धांत को नहीं माना। उनके सिद्धांतों ने समाज के समृद्ध लोगों के लिए एक सामाजिक हुकूमत का डर-सा खड़ा कर दिया। इससे मक्का में चल रही सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था पर खतरा पैदा हो गया और उनके खिलाफ विरोध होने लगे।

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